सोमवार, 5 सितंबर 2011

ये रंग देखा है कहीं

छत्तीसगढ़ के अपने ही रंग है। अभी चारों ओर हरियाली बिखरी पड़ी है। बारिश थमते ही जब त्योहारों का दौर शुरू होगा तो संस्कृति अपने पूरे यौवन में नजर आएगी।देश के दिगर हिस्सों की तरह दीपावली का त्योहार यहां का सबसे बड़ा त्योहार है। राऊत समाज इसे अपने ही अंदाज में मनाता है। वे नाच-गाकर अपनी खुशियां बिखेरते हैं। रायपुर के टाउन हाल में राऊतों का एक ऐसा ही दल मुझे कुछ साल पहले नजर आया। एक कलाकार ने जिस तरह का वेश धर रखा था, उसने मुझे बेहद प्रभावित किया। शायद इसलिए भी कि पहले एक नाटक में मैंने भी लगभग ऐसी ही भूमिका अदा की थी, जिसकी तस्वीर पुरानी पोस्ट में है। मैंने उससे अनुरोध करके उसकी तस्वीर  ली। शेयर कर रहा हूं। पसंद आए तो दाद चाहता हूं।
खूबसूरत

7 टिप्‍पणियां:

  1. और कुछ पसंद आये न आये मगर आप की लिखी यह दो lines मुझे बेहद पसंद आई हैं.... बारिश थमते ही जब त्योहारों का दौर शुरू होगा तो संस्कृति अपने पूरे यौवन में नजर आएगी। धन्यवाद....

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  3. अति सुन्दर. अभी तो बारिश थमने का नाम ही नहीं ले रही है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता मासूम और हसीन चेहरा.

    उत्तर देंहटाएं