बुधवार, 21 सितंबर 2011

उस खुद्दारी का हमसे गहरा नाता है (गुजरात के भूकंप की आंखों-देखी-3)

रायपुर, 6 फरवरी 2001 (देशबन्धु)।
-चलो भाइयों कच्छ चलो।
-कच्छ क्यों जाएं भाई, वहां आखिर धरा क्या है।
-आवड़-बावड़ ने बोरड़ी, व्या कंडा ने कक्ख
भाइयूं हलो कच्छड़े जिद माड़ू सवाया लख


(यह ठीक है कच्छ की धरती में बबूल और बेर जैसी कटिली झाड़ियों के अलावा ज्यादा कुछ नहीं है, नहीं भाई वहां का एक-एक आदमी सवा-सवा लाख का है)
इस लोकोक्ति में भी कच्छ के आदमी की कीमत बहुत कम आंकी गई है। वहां के एक-एक आदमी की खुद्दारी एवं जीजिविषा के सामने दुनिया की सारी दौलत फीकी पड़ जाती है। भूकंप से पूरी तरह तबाह हो जाने के बाद भी उन खुद्दारों ने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाए। कोई मदद के लिए आगे आ गया तो भी उनके हाथ मदद लेने के लिए हिचकते रहे। वे खुले आसमान के नीचे ठंड की कड़कड़ाती रात बिता रहे थे, फिर भी कहीं कोई शिकायत नहीं थी। मासूम बच्चों के पेट में भूख कुलबुला रही थी, प्यास गले को नोंच रही थी, फिर भी कोई शिकायत नहीं।
इन खुद्दारों से छत्तीसगढ़ की गहरी रिश्तेदारी है। भुज और भचाऊ के 40-50 किलोमीटर के दायरे में जो गांव हैं, उनमें से बहुत गांवों के बेटे छत्तीसगढ़ में आकर बस गए हैं। उन गांवों की बेटियां छत्तीसगढ़ की बहुएं बनकर भी आईं हैं। और छत्तीसगढ़ की बेटियों को उन गांवों में घर मिला है। अकेले रायपुर में गुजरातियों की अनुमानित संख्या 50 हजार होगी। इनमें से ज्यादातर उन्हीं इलाकों के हैं, जहां भूकंप ने कहर बरपाया है। भुज से 18 किलोमीटर पहले और मुख्य सड़क से 4 किलोमीटर भीतर की ओर देवजीलाल का बाड़ी विस्तार है। देवजीलाल के परिवार के कई और घर इसी बाड़ी विस्तार में बसे हुए हैं। इस इलाके में इस बाड़ी विस्तार को उमिया बाड़ी विस्तार के नाम से जाना जाता है। भूकंप के विध्वंस ने यहां के भी घरों को तबाह कर दिया। उमिया बाड़ी विस्तार की 2 बहुएं उसी दिन भचाऊ के अस्पताल में काल का ग्रास बन गईं। इनमें से एक दमयंती बेन रायपुर निवासी टिम्बर व्यवसायी मोहन भाई की सगी बहन थी। 25 जनवरी को दवरानी मंजूला बेन को लेकर दमयंती बेन भचाऊ अस्पताल गई थीं। उनके साथ मोहन भाई के भांजे यानी दमयंती बेन के बेटे गोविंदलाल भी थे। मंजूला बेन की तबियत कुछ खराब थी। डाक्टर ने जांच पड़ताल के बाद उन्हें उस दिन अस्पताल में ही ठहर जाने को कहा। 26 जनवरी की सुबह गोविंदलाल को गुटके की तलब हुई तो वे अस्पताल से बाहर निकल आए। वे गुटके-सिगरेट की दुकान तक पहुंचे भी नहीं थे कि धरती डोलने लगी और पीठ के ठीक पीछे अस्पताल भरभरा कर गिर पड़ा। बहुत से मरीजों, डाक्टरों, नर्सों के साथ-साथ दमयंती बेन और मंजूला बेन मलबे के नीचे दब गईं। क्षणभर में भचाऊ मलबे में बदल गया। जो मलबों के भीतर जिंदा थे चीख-पुकार रहे थे। और जो मलबों के बाहर सुरक्षित बच गए, इस अप्रत्याशित दृश्य को देखकर सहमे हुए थे। फिर भी बहुत से लोगों ने बहुत से लोगों को मलबे से बाहर निकालने की कोशिशें भी कीं। थोड़े से हाथ थे और शहरभर में मलबा। मंजूलाबेन अस्पताल के मलबे के भीतर 2 दिनों तक जिंदा रहीं। मलबे से उनकी आवाज बाहर आती रही। फिर वे शांत हो गईं...हमेशा-हमेशा के लिए शांत। जब मलबा हटाया गया तो पता चला कि मंजूला बेन के पैरों पर बीम पड़ी हुई थी। दमयंती बेन तो पहले दिन ही खामोश हो चुकी थीं।
उधर उमिया फार्म भी तबाह हो गया। 30 जनवरी को जब मैं रायपुर के पाटीदार समाज के राहत दल के साथ वहां पहुंचा तो हमने देखा कि उस संपन्न परिवार की महिलाएं एक तंबू जैसी जगह पर रसोई तैयार कर रही हैं। बाड़ी विस्तार के घरों की दीवारें औंधी पड़ी हैं। उस दिन तक वहां इन लोगों का हालचाल जानने कोई नहीं आया था। न तो सरकारी कर्मचारी और न ही कोई संस्था। जबकि इस फार्म से 4 किलोमीटर दूर भुज की ओर जाने वाली सड़क पर राहत सामग्री से लदी ट्रकों  और सेना की गाड़ियों की रेलमपेल मची हुई थी। ऐसे सभी वाहनों की दिशा भुज, भचाऊ, अंजार जैसे शहरों की ओर ही थी।
उमिया बाड़ी विस्तार के लिए तम्बुओं की तत्काल जरूरत थी। 4 दिन वे लोग कड़ाके की ठंड सहकर गुजार चुके थे। लेकिन उनमें से कोई भी न तो भुज गया, न भचाऊ, जहां राहत सामग्री का ढेर लगा हुआ था। रायपुर के राहत दल ने यदि खुद जाकर वहां का हालचाल न देखा होता तो शायद उन्हें कुछ और रातें बिना तंबुओं के गुजारनी पड़ती। यहां के राहत दल ने वहां बांस और दूसरे अन्य सामान बांटे। इस राहत दल के साथ मैं आगे भुज तक गया। वहां मुझे छो़ड़कर यह दल नखतराणा के दूसरे गांवों की ओर बढ़ गया। नखतराणा के उस इलाके में भी रायपुर की रिश्तेदारी पसरी हुई थी।
इधर, शहरों में दिखता था कि राहत सामग्री का ढेर लगा हुआ है। उधर, गांवों में खुली जगहों पर ठंड से ठिठुरते लोग नजर आते थे। रायपुर के राहत दल से अलग होकर अंजार और भचाऊ होता हुआ मैं 2 अन्य रिपोर्टरों के साथ बाड़ी विस्तारों की ओर लौटा। दरागा बाड़ी विस्तार में एक फार्म में भी ध्वंस का वही आलम था। यहां पर भूकंप से जयाबेन नाम की 33 साल की एक महिला की मौत हो गई थी। यहां पता चला कि यहां के निवासी हरीभाई के साढ़ू विश्राम शिवजी रायपुर में रहते हैं। कबराऊ बाड़ी विस्तार में 10 साल की बच्ची निशा बेन भूकंप में बुरी तरह घायल हो गई। यह दयाभाई खेमजी का बाड़ी विस्तार है, जहां उनके परिवार के 12 सदस्य रहते हैं। विध्वंस के बाद ये सभी खुले आसमान में दिन काट रहे थे। यह 1 फरवरी की बात है। यानी भूकंप के मुख्य झटके के 6 दिनों बाद की। यहां तक भी किसी तरह की कोई मदद नहीं पहुंची थी और न ही इन लोगों ने कहीं हाथ पसारे थे। इतनी बरबादी के बाद भी दयाभाई खेमजी का आतिथ्य के प्रति उत्साह कम नहीं हुआ। उन्होंने हमें बाड़ी विस्तार से तोड़कर पपीते खिलाए। दरागा बाड़ी विस्तार के ही पंचवटी फार्म में 3 घर थे। भूकंप में यहां के निवासी जयंती देवजीभाई की मां का हाथ फ्रेक्चर हो गया। जिस दिन हम इस बाड़ी विस्तार में पहुंचे उस दिन डाकोर से जयंती भाई के रिश्तेदार मदद के रूप में जलाऊ लकड़ियां लेकर पहुंचे थे। लेकिन इन मददगारों को भचाऊ इलाके के तथाकथित जमींदार की दादागिरी सहनी पड़ी। हमने देखा कि लकड़ी लेकर आ रहे इन लोगों को जमीदार के आदमियों ने कालर पकड़कर धमकाया और उन पर आरोप जड़ दिया कि वे वहां लकड़ियों का धंधा कर रहे हैं। इस जमीदार का नाम तो मालूम नहीं हो पाया, लेकिन लोग उसे बापा कहकर बुला रहे थे।
उस पूरे दरागा बाड़ी विस्तार में करीब 3 सौ घर हैं। वहां के हर घर में यदि औसतन 5 सदस्य मान लिए जाएं तो बाड़ी विस्तार में रहने वालों की औसत संख्या 15 सौ होगी। 1 फरवरी तक हमने पाया कि 15 सौ लोगों की तबाही की चिंता करने वाला कोई नहीं था। हालांकि इस बाड़ी विस्तार के किसान संपन्न हैं, लेकिन प्रकृति ने उन्हें भी उसी कतार में लाकर खड़ा कर दिया है जहां पर कच्छ का आम हैसियत वाला आदमी खड़ा है।
ऐसा नहीं है कि खुद्दारी संपन्न तबके तक ही सीमित है। गांव का आदमी हमें और भी ज्यादा खुद्दार नजर आया। हम कबराऊ गांव पहुंचे। 12 सौ की आबादी वाले इस गांव में 274 घर थे। भूकंप में यहां 71 लोगों की मौत हो गई और कम से कम 80 लोग जख्मी हुए। गांव तो पूरी तरह तबाह हुआ ही।यहां पर मुंबई के व्यापारियों ने कैंप लगाया हुआ था। उन व्यापारियों में से एक हीरे का व्यवसायी हमसे चर्चा के दौरान यह कहते हुए फफक पड़ा कि यहां के लोगों को मदद देने के लिए मिन्नतें करनी पड़ती है। वे खुद मदद लेने के लिए मिन्नते नहीं करते।
गांववालों की खुद्दारी वोंध में भी देखने को मिली जो भचाऊ से 6 किलोमीटर दूर है। वहां पर मुख्य सड़क के किनारे नर्मदा वली फर्टीलाइजर कंपनी ने राहत शिविर लगाया था। वोंध पूरी तरह तबाह हो चुका है। यहां पर 2 हजार मौतें हुई हैं। कंपनी के अधिकारियों ने बताया कि गांववालों ने उनसे अनाज तो लिया लेकिन साथ ही ग्रामीण महिलाओं ने कहा कि वे पूरे गांव की रसोई खुद तैयार करेंगे और कंपनीवालों को भी खिलाएंगी। ऐसा नहीं है कि मददगारों की मदद लेने खुद होकर एक भी सामने नहीं आया। बहुत थोड़े से लोग ऐसे भी थे। लेकिन इनकी भीड़ नहीं थी। 10-20 किलोमीटर के फासले पर इक्का-दुक्का परिवार राहत सामग्री से लदे वाहनों पर टकटकी लगाए नजर आ जाते थे। लेकिन कच्छ की बड़ी आबादी बिना शिकायत के त्रासदी झेल रही थी। वहां के लोग मदद ले भी रहे थे तो उतनी ही, जितने से काम चल जाए। अंजार के खंभरा गांव में मददगारों ने जब बिस्किट के पैकेट बांटे तो गांववालों ने यह कहते हुए लौटा दिया कि वे सुबह का नाश्ता नहीं करते। ये पैकेट किसी और के काम आ जाएंगे।

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2 टिप्‍पणियां:

  1. दहली जिंदगी मन दुखित हुआ पढ़ का सहायता नहीं
    अमरीका के भारतीये लोगों ने बहुत सहायता भेजी गुजरात के लिए पता नहीं
    सहायता संस्थायों के सदस्य सयम ही और आगे नहीं पहुचाई होगी

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  2. हालात बुरें हैं पर आदमी आदमी रहे, ये बड़ी बात है।
    कच्‍छ वालों से यह सीखा जा सकता है

    जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?

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