मंगलवार, 17 अगस्त 2010

पैसा-वैसा शोहरत-वोहरत ठेंगे पर

  केवल कृष्ण
रायपुर। बरसों पहले पढ़ी एक कविता के कुछ शब्द याद आ रहे हैं:-
एक चिड़िया का बच्चा/ सूरज की तपिश से झुलसने लगा/ तो जाने क्या सूझी/ कि सिर उठाकर थूक दिया/ सूरज  के मुंह पर...
पता नहीं क्यों, नत्था से मुलाकात के वक्त यही कविता जेहन में गूंज रही थी। मीडिया बार-बार एक ही सवाल कर रहा था-कहीं गुम तो नहीं हो जाओगे नत्था? ये कामयाबी दुहरा पाओगे? नत्था ने पटक कर जवाब दिया-कामयाबी मिलती रहे तो ठीक, वरना मैं थिएटर में भी खुश हूं।
आमिर खान की फिल्म पीपली लाइव का मुख्य किरदार नत्था यानी ओंकारदास मानिकपुरी भारी कामयाबी के साथ अपने घर छत्तीसगढ़ लौटा है। अपने ठेठ छत्तीसगढ़िया रंग और ठेठ छत्तीसगढ़िया अंदाज में। धन-दौलत, नाम-वाम ठेंगे पर।
nattha apni patni ke sath, jamul (bhilai) me
कामयाब नत्था को दुनिया कंधे पर उठाकर नाच रही है। जगह-जगह जलसे हो रहे हैं। नत्था का स्वागत हो रहा है। फूल-मालाएं पहनाई जा रही हैं। एक जलसा जामुल में भी हुआ। जिन लोगों के साथ नत्था ने गरीबी की रोटियां बांटी, भूख बांटी, सुख बांटा, दुख बांटा, वे लोग नत्था के स्वागत के लिए मालाएं लिए खड़े थे। बिलकुल अपने लोग-मां, पत्नी, बेटियां, बेटा, भाई, बहनें, साले-समधी..थोड़े से नेता और थोड़े से अजनबी लोग। दुनियाभर के कैमरे जिस चेहरे को जूम करके क्लोज शॉट लेने को आतुर हों, जिस पर फ्लैशगन रौशनी की लगातार बौछार कर रहीं हों, सैटेलाइट की आंखें जिस पर आ टिकी हो, वो आदमी इस बेहद मासूम और बेहद मीठे पल में गदगद था। यह बेहद मामूली सा स्वागत उसे रोमांचित कर रहा था और जज्बात इस कदर हावी हो रहे थे कि शब्द कांप रहे थे। जामुल के रावणभाठा मैदान में एक छोटा-सा मंच है। टैंटवाले ने थोड़ा-बहुत कनात-पंडाल तान दिया था। एक माइक था, जैसा कि गांवों में होता है, लंबी-लंबी सीटियों वाला, माइक टेस्टिंग वन-टू-थ्री-फोर वाला। एक मंच संचालक पूरी श्रद्धा, आदर और सम्मान के साथ एक के बाद एक वक्ताओं  को न्योता दे रहा था। नत्था की छुटकी बिटिया गीतू कभी मंच पर डोल रही थी तो कभी मंच के नीचे बैठी अपनी मां की गोद में मचल रही थी। मीडिया के लोग रिश्तेदारों को टटोल रहे थे-नत्था गरीब है तो कितना गरीब है? वो रहता कहां है? खाता क्या है? पैसे मिले हैं तो अपनी झोपड़ी को दुरुस्त करवाएगा क्या? आगे भी रोजी-मजदूरी करेगा या फिर नौकरी करेगा? अब फिल्में ही करेगा कि थिएटर भी करता रहेगा?
दो लाख रुपए में से नत्था को डेढ़ लाख रुपए मिले थे। नत्था कहता है-वो तो मैंने खाकर उड़ा दिए। सन् 2008 में पीपली लाइव के लिए आडिशन हुआ था, इसके बाद से लेकर अब तक परिवार भी तो चलाना था। शूटिंग से लेकर फिल्म रिलीज होने तक आमदनी का और कोई जरिया भी तो नहीं था। अभी 50 हजार रुपए और मिलने हैं। अब इतने रुपयों से उसकी झोपड़ी तो बंगले में तब्दील होने से रही। बच्चे अच्छे स्कूलों में दाखिल होने से तो रहे। गरीबी और फांका-मस्ती तो जाने से रही। इस कलाकार का संघर्ष थमने से तो रहा। ...यानी इस बार भी नत्था की कामयाबी  का फुटेज जुटाने गई मीडिया की भीड़ को मायूसी ही हाथ लगी। अब वही सवाल एक बार फिर आकर खड़ा हो गया है-ये नत्था मरेगा कि जिएगा।
नत्था, सॉरी, ओंकारदास मानिकपुरी की मां गुलाबबाई बताती हैं कि बचपन में पिता ने बहुत चाहा कि नत्था थोड़ा-बहुत पढ़ लिख ले। नत्था को नहीं पढ़ना था, सो नहीं पढ़ा। बचपन में ही टीन-टप्परों की पीटकर देख लिया था कि इनसे कितनी तरह की ताल निकाली जा सकती है। इस रिदम पर डांस के कितने स्टेप निकाले जा सकते हैं। पता था कि नाटक-नौटंकी रोटी नहीं दे सकती, तब भी नौटकीबाज हो गया। गुरुओं को ढूंढ-ढूंढकर गुर सीखे और पक्का गम्मतिहा हो गया। हबीब तनवीर की नजर पड़ी तो 70 रुपए रोजी में अपने साथ ले लिया। जो कलाकर अपनी कला को जिंदा रखने के लिए र्इंट-गारे ढो रहा हो, उसे वही कला यदि पेटभर भोजन का भरोसा दे रही थी। इससे बढ़िया बात और क्या हो सकती थी। ओंकारदास उर्फ नत्था हबीब साहब के साथ हो लिए। धन्य है नत्था की बीवी शिवकुमारी, पति को टोका तक नहीं। उल्टे मौका मिला तो अपने बेटे देवेंद्र को भी इसी दुनिया में झोंक दिया। देवेंद्र ने पीपली लाइव में भी नत्था के बेटे का ही किरदार निभाया है। वैसे इस फिल्म में धनिया के किरदार के लिए खुद शिवकुमारी ने भी आडिशन दिया था, पर बेचारी कामयाब नहीं हो पाई। वह पति की कामयाबी पर ही कुप्पा हुई जा रही है, यहां हम जो तस्वीरें छाप रहे हैं उनमें जरा शिवकुमारी की आंखों में चमक तो देखिए।
किसी ने जामुल में नत्था से सवाल किया-क्या आप इसे किस्मत मानते हैं या कामयाबी प्रतिभा की बदौलत मिली? नत्था का जवाब ईमानदार था। उसने कहा कि किस्मत मेहरबान रही। नत्था की भूमिका के लिए भोपाल के सभी थिएटरों के कलाकारों का आडिशन लिया गया था। चूंकि पीपली लाइव की डायरेक्टर अनुषा रिजवी का हबीब तनवीर के ग्रुप नया थिएटर में आना-जाना था, इसलिए उन्होंने वहां से भी कलाकार मांग लिए। एक साथ पांच कलाकार आडिशन के लिए भेजे गए। पहले तीन कलाकारों का आॅडिशन होते तक समय पूरा हो गया। ओंकार को दूसरे दिन आने को कहा गया। दूसरे दिन ओंकार ने जिस रोल के लिए आॅडिशन   दिया, वह मछुआ का रोल था। हिस्से में सिर्फ दो लाइन का संवाद आया था। आमिर खान और अनुषा रिजवी ने सभी आॅडिशन के रिजल्ट देखे और ओंकार का परमार्मेंस देखर कहा-मिल गया नत्था। 
ओमकार तो इसे अपनी किस्मत मानते हैं। और आप क्या मानते हैं?

(नेशनल लुक में दिनांक 17 अगस्त को प्रकाशित रपट, फोटो-दिनेश यदु, नेशनल लुक, रायपुर)

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्‍दर रपट लिखा है भाई, धन्‍यवाद.

    आपका यह ब्‍लॉग आज देखा, शव्‍दों में अभिव्‍यक्ति का आपका अंदाज पसंद आया. छत्‍तीसगढ़ ब्‍लागर्स चौपाल में आपका स्‍वागत है।

    आरंभ में पढें सत्‍य को उद्घाटित करने वाली पत्रकार आाशा शुक्‍ला को वसुन्‍धरा सम्‍मान

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  2. एक अच्छी प्रस्तुति है|धन्यवाद|

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  3. हम आप के लिऐ काफी सुखद मसाला हो सकता हैं पर नत्‍था को तो अब फिल्‍मी सच्‍चाई से अब दो दो हाथ करने हैं हर कोई अमिताभ तो हो नही सकता............सतीश कुमार चौहान भिलाई

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