मंगलवार, 16 नवंबर 2010

रिसते रिश्ते

वो एक रंगकर्मी था। भावनाओं और संवेदनाओं का बड़ा कद्रदान। एक खूबसूरत दुनिया का वह ख्वाब देखा करता था। एक ऐसी दुनिया जो प्रेम से लबालब हो। उसने खुद की जिंदगी के लिए भी एक ख्वाब देखा। एक छोटे से परिवार का ख्वाब। एक ऐसी हमसफर का ख्वाब जो रसोई से लेकर थिएटर तक उसकी हमकदम हो। जिसके ख्वाब उसके ख्वाबों जैसे हों। खूबसूरत दुनिया को रचने में जो उसकी मददगार हो। उसने अपने परिवार में एक छोटी सी बिटिया की कल्पना की थी। जिसे वह ऐसे संस्कार देना चाहता था, जैसे संस्कारों की जरूरत इस दुनिया को है। लेकिन जब हकीकत का सामना हुआ तो जिंदगी नर्क हो गई। शादी एक ऐसी लड़की से हुई, जिसके लिए न तो कला का कोई अर्थ था और न ही दुनिया को खूबसूरत बनाने के जुनून से उसे कोई मतलब था। उसके लिए नारी होने का अर्थ वैसा नहीं था, जैसा वह कलाकार सोचता था। वह तो अपना अलग अस्तीत्व चाहती थी, अलग पहचान। उसके लिए मां बनने का भी कोई अर्थ नहीं था और ऐसे पचड़ों में वह पड़ना नहीं चाहती थी। वही हुआ जो होना था, खटपट बढ़ती गई। एक दिन दोनों के रास्ते अलग हो गए।
कलाकार जिंदगी से निराश नहीं था। हालात से परेशान जरूर था। परेशानी के इन्हीं दिनों में एक महिला मित्र ने उसकी भवनाओं को सहलाया। निकटता बढ़ी तो कलाकार को लगा कि यही वह किरदार है जिसकी तलाश उसे अपनी जिंदगी के लिए थी। दोनों ने तय किया और शादी कर ली। कलाकार की कल्पनाशीलता को पर लग गए। अब तो रंगमंच से घर तक हमकदम साथ थी। अब तो खूब नाटक खेले जा सकते थे। नाश्ते की टेबल पर स्क्रीप्ट  पर चर्चा हो सकती थी। घूमते-टहलते संवादों की डिजाइनिंग की जा  सकती थी। तो जिंदगी रिहर्सल में बीतने लगी। नयी बीबी अब उसके नाटक की अभिनेत्री थी और खुद निर्देशक। रिहर्सल, रिहर्सल और रिहर्सल। कलाकार खुश था, बहुत खुश। यह खुशी तब और बढ़ गई जब उसे एक और दोस्त मिल गया। यह शख्स थिएटर  से वास्ता तो नहीं रखता था, लेकिन कलाकारों की खूब इज्जत करता था। कलाकार, उसकी बीबी और उनका नया दोस्त जिंदगी के ज्यादातर लम्हों में साथ होते। नये दोस्त के आ जाने से नयी बीबी को भी जिंदगी में कुछ नया पन महसूस होने लगा। नाटकों के घिसे-पिटे संवादों की जगह असल जिंदगी के नये और ताजे संवाद सुनने को मिले तो सुकून मिला। नये दोस्त के इंद्रधनुषी जीवन के कितने ही रंग नयी बीबी के ख्वाबों में घुलने लगे। उसे लगने लगा कि नाटकों की नकली जिंदगी से बेहतर है कि असल जिंदगी के असल पलों का मजा लूटा जाए। एक रोज वह उस कलाकार को छोड़कर अपने नये साथी के साथ हो ली।
नयी बीबी और उसके नये साथी की जिंदगी मजेदार थी। दोनों को वह सब कुछ मिला जो वे चाहते थे। समय बीता। समय के साथ-साथ नये दोस्त को महसूस हुआ कि कलाकार अब भी उन दोनों के बीच मौजूद है। नयी बीबी अपने पति को भूल नहीं पा रही। जिंदगी में सबकुछ पाकर भी वह उदास है। नया दोस्त उदार नजरिये का था। उसने उससे कह दिया कि यदि ऐसा है तो वह कभी भी पुराने पति के पास लौट सकती है, उसे कतई बुरा नहीं लगेगा।
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रायपुर में इन दिनों मुक्तिबोध नाट्य समारोह चल रहा है। एक नाटक देखकर आए एक दोस्त ने संक्षिप्त कथानक सुनाया था। कथानक सुनने के बाद रिश्तों, सपनों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानव अधिकार, नारी स्वतंत्रता, मर्दना तानाशाही जैसे शब्दों के बीच उलझा हुआ हूं। हो सकता है कि नाटक में इन शब्दों की विस्तृत व्याख्या की गई हो, लेकिन मैं वंचित रह गया। क्या आप इनकी व्याख्या कर मेरी मदद कर पाएंगे। (नाटक का नाम शायद कच्चे लम्हे था, और शायद इसे गुलजार ने लिखा है)

1 टिप्पणी:

  1. शायद अब ये सोचने का वक्त निकला जा रहा है हमने लिखने के नाम पर इतना मसला कहानियों मे भर दिया है कि सब कुछ सच नज़र आता है\ जबकि हकीकत मे ऐसा होता नही। रिश्तों मे छेद कर के उनमे से मवाद ही निकलेगा। साहित्य से जब जीवन दर्शन का क्षरण होने लगे तो यही होगा। हम और आप केवल सोचते रहेंगे। धन्यवाद।

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