सोमवार, 1 नवंबर 2010

... छोड़ो ये ना सोचो

सोचता हूं कुछ लिखूं
क्या लिखूं
लिखने से पहले सोचना बहुत जरूरी होगा शायद
और सोचना तो बरसों पहले ही छोड़ दिया है मैंने
सोचता कौन है
वही, जो जिंदा रहता है
यानी सोचने के लिए आदमी का जिंदा रहना पहली शर्त है
ठहरिए, मैं खुद को पहले टटोल लूं
क्या इतने दिनों तक सोचे बिना जिंदा हूं मैं
इधर कुछ धड़-धड़ कर रहा है
ध्यान से सुनता हूं तो सांसों की भी आवाज आती है
हाथ-पांव हिल तो रहे हैं, हंस तो रहा हूं, रो तो  रहा हूं
यानी जिंदा हूं मैं
तो निष्कर्ष यह कि बिना सोचे भी जिंदा रह सकते हैं हम
तब सोचना ही क्यों


पहले जब सोचता था
याद है, सोचते हुए बहुत तकलीफ होती थी
तब सोचता था कि लोग मेरी तरह सोचते क्यों नहीं
जितना सोचता उतनी ही तकलीफ होती
सोचा, दूसरों की तरह सोचना छोड़ क्यों न दिया जाए
तो मैने सोचना छोड़ दिया
सच पूछिए, न सोचते हुए बड़ा सुकून मिला
मेरी आंखें खुली हुईं थीं
दिमाग बंद
जब नक्सलियों ने 76 जानें लीं, मैंने नहीं सोचा
पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ किए मैंने नहीं सोचा
कारखाने की चिमनी भरभरा कर गिरी
दफ्न हो गए सैकड़ों मजदूर
पखांजूर में गरीब की लाश कुत्तों ने नोच ली
नारायणपुर में चंद्रू का घर बारिश में बह गया
सलमान खान ने यहां-वहां छेद डाला
मैंने नहीं सोचा, देखा जरूर
अरुंधती का बयान देखा
कलमाड़ी का जादू देखा
देखा कि मेरा राज्य कितनी तरक्की कर रहा है
शहर की सरहद पसर रही है
खेत गायब हो रहे हैं
जमीन बेचकर किसान मोटर साइकिलों में फर्राटे भर रहे हैं
देखा मैंने कि
स्कूल भी गरीबों और अमीरों में बंट गए
देखा मैंने कि
महंगे अस्पतालों से मायूस
जनता रामदेव बाबा के आसन सीख रही है
आसाराम बापू के नुस्खे आजमा रही है
देखा कि
राखी सावंत फैसले कर रही है
वेदांता और जिंदल पुरस्कृत हो रहे हैं

सोचा नहीं
मैंने सोचा नहीं
इन घटनाओं पर क्या सोचना 
क्या ये सोचने लायक हैं
मुंबई की चीखों के बारे में क्या सोचना
ठाकरे नीति के बारे में क्या सोचना
मायावती, राबड़ी, लालू के बारे में,
वरुण की जहरीली जुबान के बारे में 
नरेंद्र मोदी की सफलताओं के बारे में
कश्मीर पर देश की विफलताओं के बारे में
अमरीका, चीन, पाकिस्तान के बारे में
क्या सोचना

देखा, सुना, सूंघा, महसूसा
मैंने सोचा नहीं
सुकून से रहा मैं
सुनता हूं देश भी सुकून से है
यानी.....



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(खुदा की कसम
मजा आ गया
मुझे मारकर वो बेशरम
खा गए

खा गए
लेकिन मैं तो जिंदा हूं


ये  जीना भी कोई जीना है लल्लू,  आयं)







5 टिप्‍पणियां:

  1. मत ही सोचो, नस फटने लगती है दिमाग की...


    बहुत सही भाव!

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  2. केवल तेरी इन पंक्तियों में वो बात है कि पढने वाले की सोच के रोंगटे खडे हो जायें।

    जब नक्सलियों ने 76 जानें लीं, मैंने नहीं सोचा
    पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ किए मैंने नहीं सोचा
    कारखाने की चिमनी भरभरा कर गिरी
    दफ्न हो गए सैकड़ों मजदूर
    पखांजूर में गरीब की लाश कुत्तों ने नोच ली
    नारायणपुर में चंद्रू का घर बारिश में बह गया
    सलमान खान ने यहां-वहां छेद डाला
    मैंने नहीं सोचा, देखा जरूर
    अरुंधती का बयान देखा
    कलमाड़ी का जादू देखा

    हर विरोधाभास पर सटीक प्रहार है।

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  3. mere jamini concept ke shikhar ho aap ..


    bada anjana hu, kisi ne pahchana bhi nahi.

    pata nahi kya janana hai mujhe.
    nahi janata kya pana hai mujhe.
    saham gaya hu, dunia ki chaturayi dekhkar.
    yu lagta hai ki dunia ki doud me
    gadha rah gaya hu mai.
    kyoki kuchh nahi sikh saka hu mai.
    art of living ki asafalta ka
    sabab ban gaya hu mai
    muskurata bhi hu apni nakamiyo par
    sochta hu aap sab bhi muskura lo mujhe dekhkar
    ek arab ki bhid me kho gaya hu mai

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  4. जैसे - जैसे बच्चा बड़ा हो रहा है ,मेरी आँखों के सामने का सच धुंधला होते जा रहा है ,मेरी कानों में सच अब घुस नहीं पा रहा है , सच बोलने की कोशिश में मेरा गला भरभरा जाता है

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  5. केवल भैया | आपने सच की अभिब्यक्ति की है ,सुकून से जीने का मतलब तो बस अपनी आँखे मूंद लेना है

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