रविवार, 28 नवंबर 2010

बाप रे बाप...क्या सचमुच..

राजनीतिक दलों की प्रेस विज्ञप्तियां आम तौर पर अतिश्योक्तिपूर्ण होती हैं। राजनीति से सनी हुई और अक्सर तथ्यहीन। लेकिन छत्तीसगढ़ में रायपुर जिला कांग्रेस की ओर से जारी एक प्रेस नोट थोड़ा हटकर है। इसमें सरकारी योजना का वैज्ञानिक तरीके से विश्लेषण करने की कोशिश की गई है। हालांकि इस वैज्ञानिकता का आधार क्या है, यह स्पष्ट नहीं है। इस प्रेस नोट में उल्लेखित आंकड़े किन स्त्रोतों से या किन विशेषज्ञों से जुटाए गए हैं, यह भी स्पष्ट नहीं है, तब भी इसमें कही गई बातों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह प्रेस नोट विकास की जो तस्वीर उपस्थित कर रहा है, वह डरावनी है। यह तस्वीर कितनी सच्ची या झूठी है, इस पर अभी बहस होनी है। फिलहाल प्रेस नोटः-

  40 हजार मेगावाट उत्पादन विकास नहीं विनाश करेगा : कांग्रेस
 शहर जिला कांग्रेस ने कहा है राज्य सरकार 5 साल में 40 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन की जो योजना बना रही है उससे विकास नहीं विनाश होगा।
पार्टी के जिला संगठन मंत्री दयानंद शर्मा ने कहा है कि  छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत होल्डिंग कंपनी द्वारा यह संदेश दिया जा रहा है कि 5 वर्ष में 2,00,000 करोड़ के निवेश के लिए एमओयू हो चुका है। 40 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए जो संयंत्र छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में लगेंगे उसमें खपत होने वाले कोयले, पानी, भूमि एवं निकलने वाली राखड़ की मात्रा पूरे प्रदेश के स्वस्थ्य पर बुरा असर डालेगी। सरकार ने कभी इस बारे में शायद चिंतन मनन नहीं किया है। श्री शर्मा ने बताया है कि छत्तीसगढ़ निर्माण के समय छग की विद्युत खपत 1300 मेगावाट थी, जो 10 वर्षों में बढ़कर अब 2800 मेगावाट हो गई है। ऐसे में 40,000 मेगावाट का उत्पादन करना छग को प्राप्त प्राकृतिक सौगातों का अनुचित दोहन होगा। यहां तक कि आने वाले 80 वर्षों बाद कोयले का भंडार समाप्त हो जाएगा और पूरी आबादी विभिन्न बीमारियों से ग्रसित होगी।
कृषि भूमि पर असर-श्री शर्मा ने कहा कि 40 हजा६र मेगावाट बिजली उत्पादन करने के लिए 50,000 एकड़ भूमि की आवश्यकता पड़ेगी, जो कि अंतत: कृषकों की ही उपजाऊ भूमि होगी। परिणामत: हजारों कृषक भूमिहीन एवं बेरोजगार हो जाएंगे। कृषकों को नाम मात्र मुआवजा देकर उनकी उपजाऊ कृषि भूमि छीन ली जाएगी। इस बिजली उत्पादन के  लिए लगभग प्रतिवर्ष 23 करोड़ 80 लाख टन कोयले की आवश्यकता होगी। इतनी बड़ी तादाद में कोयले का उत्पादन, परिवहन नामुमकिन है। प्रदेश में कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जाहं रेलमार्ग और सड़क मार्ग दोनों से इतनी बड़ी मात्रा में कोयले का परिवहन कर पाना संभव है।
राखड़ की आंधियां चलेंगी-श्री शर्मा ने कहा कि 40 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन करने पर लगभग 11 करोड़ 90 लाख टन राखड़ पैदा होगी, जिसका भंडारण कर उपयोग कर पाना असंभव है। राखड़ भंडारण के लिए 50 हजार एकड़ अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता होगी। तेज हवाएं चलेंगी तो इतने बड़े राखड़  के ढेर से जो राख उड़ेगी वह वायु मंडल को प्रदूषित करेगी। पूरे छत्तीसगढ़  में राख की आंधियां चलेंगी। चिमनियों से प्रतिवर्ष वायु में 2 लाख 10 हाजर 240 टन धूल कण मिल जाएंगे। परिणामत: प्रदेश के अधिकांश भागों में अनेक प्रकार की बीमारियों का तांडव होगा। हजारों लोग अकाल मौत मारे जाएंगे। फसलें चौपट हो  जाएंगी तथा लाखों हेक्टेयर जमीन बंजर होकर बरबाद हो जाएगी।
जल स्त्रोत समाप्त हो जाएगा-इस बिजली संयंत्र के संचालन के लिए 1 अरब 60 करोड़ 60 लाख घन मीटर पानी की आवश्यकता प्रतिवर्ष पड़ेगी। प्रदेश में पानी के इतने विशाल भंडार नहीं है। वर्तमान समय में ही स्थापित उद्योगों को पानी की आपूर्ति संचित भंडारों से नहीं हो पा रही है। तब इतनी बड़ी मात्रा में पानी की आपूर्ति कहां से की जाएगी। इस पर भी विचार नहीं किया गया है।
अम्लीय वर्षा होगी- 23 करोड़ 57 लाख 4 हजार टन कोयला प्रतिवर्ष जलने पर वायुमंडल में लगभग 2 करोड़ 57  लाख 4 हजार टन सल्फर डाईआक्साइड मिल जाएगा। परिणामस्वरूप प्रदूषण एवं अम्लीय वर्षा का खतरा हमेशा मंडराता रहेगा।

1 टिप्पणी:

  1. गाली देने का मन करता है राजनीतिबाजों को...
    वोट बढ़ाते जाते हैं, उन्हें कम करने का कोई उपाय नहीं करते..

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