बुधवार, 3 नवंबर 2010

जल रहे जज्बात

  शब्द मायूस हैं
संवेदनाएं खामोश
जज्बातों के खंडहर में
फड़फड़ा रही है अभिव्यक्ति
ये कैसा समय है दोस्तों
कि हम और तुम
बहुत कुछ कहना चाह रहे हैं
और कुछ भी कह नहीं पा रहे

कितनी गर्म है हवाएं
और कितनी भयंकर ये रात
सूरज कैद है
दुश्मनों की हवेली में
पर जरा ठहरो. . .
उधर वो उजियाला कैसा
वो लहराता उजियाला
वही वो मद्दिम-मद्दिम सा
कुछ जल रहा है वहां
अरे!!
ये तो जज्बात हैं
हमारे तुम्हारे
ये तो फड़फड़ाती अभिव्यक्ति है
हमारी तुम्हारी
. . . . . तो रोशनी की उम्मीद
अभी बाकी है दोस्तों!!

-केवल कृष्ण

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा

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  2. आपको दीपावली की ढेर सारी  शुभकामनाएं.

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  3. 'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय ' यानी कि असत्य की ओर नहीं सत्‍य की ओर, अंधकार नहीं प्रकाश की ओर, मृत्यु नहीं अमृतत्व की ओर बढ़ो ।

    दीप-पर्व की आपको ढेर सारी बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं ! आपका - अशोक बजाज रायपुर

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