सोमवार, 29 नवंबर 2010

दिक्कत लालाजी में नहीं है

संजीव भाई,

बरसों पहले छपी लालाजी की एक किताब
 ( फोटो-साहित्य शिल्पी से साभार)
आपने और राजीव ने जो मुहिम छेड़ी है उसके लिए साधुवाद। आपने मेरे ब्लाग पर टिप्पणी छोड़ी है, उसके लिए भी आभार। राजीव की इन पंक्तियों ने मुझे भीतर तक हिला दिया है कि यदि आप लालाजी को नहीं जानते तो मुक्तिबोध को भी नहीं जानते। आपने अपने ब्लाग में इसी लाइन को हेडिंग बनाया है। संजीव भाई, आप ही बताइए कि मैं लालाजी को जानूं भी तो कैसे जानूं। उनकी कृतियों तक कैसे पहुंचा जा सकता है। एक किताब कई साल पहले पढ़ी थी-बस्तर, इतिहास और संस्कृति। शायद मप्र साहित्य अकादमी ने प्रकाशित की थी। दहाड़ती जिंदगी, मिमयाते परिवेश के चिथड़े की तस्वीर राजीव ने साहित्य शिल्पी में छापी है। यहां-वहां कुछ आलेख लालाजी के पढ़े थे, बरसों पहले। सांस्कृतिक आलेख। मध्यप्रदेश संदेश में भी थोड़ा बहुत पढ़ा  था शायद। कुछ कविताएं पढ़ीं। क्या इतना भर पढ़ लेने से लालाजी को जान लेना होता है। लालाजी के पास बैठो तो लगता है कि अरे हम इनको कितना कम जानते हैं। उनकी हर बात गहरे अनुसंधान से निकली होती है। वो बता सकते हैं कि आदिवासी लड़कियों के जुड़े की डिजाइन कैसे बदलती जा रही है। जूड़े में खोंचा जाने वाला कंघा लकड़ी से बदलकर कैसे प्लास्टिक का हो गया। वे इसी उदाहरण का छोर पकड़कर बता सकते हैं बस्तर की मौलिकता और परस्परता को बाजार कैसे निगलता जा रहा है। मैं यदि लालाजी को जानना चाहूं तो कैसे जानूं आप ही बताइए। क्या उनकी रचनाएं कहीं पर आसानी से उपलब्ध हैं। बहुत से अखबारों और पत्रिकाओं में वे छपे जरूर, पर रचनाएं बिखरी हुई हैं। इन सबको एक जगह पढ़ना चाहूं तो कैसे पढ़ूं। लालाजी के बारे में इतना भर जानता हूं कि उनके पास अभी इतना कुछ है कि साहित्य और इतिहास को वे मालामाल कर सकते हैं। लालाजी ने बहुत सी लोककथाएं लिखीं, बच्चों के लिए उन्होंने लिखा, हल्बी, भतरी, छत्तीसगढ़ी को रचनाओं से समृद्ध किया। मैं इन सबों को एक साथ पढ़ना चाहता हूं। कैसे पढ़ूं। नारायणलाल परमारजी को मैंने प्राइमरी और मिडिल की किताबों में पढ़ा-बूंदो का त्योहार, आलसी राम अंगद। मध्यप्रदेश के जमाने में। छत्तीसगढ़ बनने के बाद क्या किसी स्कूली किताब में लालाजी भी मौजूद हैं, यदि ऐसा है तो मुझे बताइए मैं उन्हीं किताबों को पढ़ लूंगा। 
तब तो भाई आप मानते हैं न कि लालाजी को मैं कितनी मजबूरीवश नहीं जानता। चलिए अब उन लोगों की बातें करें जो लालाजी को जानते हैं। यानी वे वही लोग होंगे जो मुक्तिबोध को भी जानते होंगे। तो मेरी शिकायत यह है कि इन लोगों ने ऐसा कुछ क्यों नहीं किया कि मैं भी लालाजी को जान पाता। मुक्तिबोध की कुछ रचनाएं मैंने पढ़ी हैं-चांद का मुंह टेढ़ा है, लकड़ी का रावण, अंधेरे में....आदि। मुक्तिबोध कठिन कवि हैं।  लालाजी की रचनाएं बिना किसी बौद्धिक अवरोध के सीधे दिल में उतरती हैं। मुक्तिबोध को पढ़ने से दिमाग झनझना उठता है तो लालाजी को पढ़ने से दिल में हलचल होने लगती है। ये मेरा अनुभव है, हो सकता है कि किसी और का अनुभव कुछ और हो। यानी मुक्तिबोध दिमाग के कवि हैं और लाला जगदलपुरी दिल के। मुक्तिबोध दिमाग से दिल में उतरते हैं और लालाजी दिल से दिमाग में चढ़ जाते हैं। दोनों की प्रतिबद्धता अपने जैसे ही आम लोगों के लिए है।मुक्तिबोध पूछते हैं-कामरेड, तुम्हारी पालिटिक्स क्या है। और लाला जगदलपुरी कहते हैं-विचारधारा और साहित्य के अनिवार्य संबंध को मैं मानवीय दृष्टि से महसूस करता आ रहा हूं। मुक्तिबोध अपनी विचारधारा को स्वयं उद्घोषित करते है। लालाजी के विचारों की उद् घोषणा उनका साहित्य करता है- 

पेड़ कट-कट कर
कहां के कहां चले गए
पर फूल रथ, रैनी रथ,हर रथ
जहां का वहीं खड़ा है
अपने विशालकाय रथ के सामने
रह गए बौने के बौने
रथ निर्माता बस्तर के
और खिंचाव में है
प्रजातंत्र के हाथों
छत्रपति रथ की
राजसी रस्सियां

और 

 'भतरी' बोली में कविता को देखें –

आमी खेतेआर, मसागत आमर
आमी भुतिआर, मसागत आमर
गभार-धार, मसागत आमर
नाँगर-फार, मसागत आमर
धान-धन के नँगायला पुटका
हईं सौकार, मसागत आमर

[अनुवाद:- हम खेतीहर, मशक्कत हमारी, हम मजदूर मशक्कत हमारी। गभार हो या धार,मशक्कत हमारी। हल-फाल, मशक्कत हमारी। धान-धन को हडप गया ‘पुटका’, वही हो गयासाहूकार मशक्कत हमारी]

(उपरोक्त दोनों कविताएं साहित्य शिल्पी से)



यानी लालाजी और मुक्क्तिबोध दोनों की कविताएं विचारों की सान पर तेज होती हैं। और प्रतीत होता है कि ये सान एक ही है। मुक्तिबोध पर बहुत कुछ लिखा गया, उनकी रचनाएं आसानी से उपलब्ध हैं। कुछ अप्रकाशित भी जब-तब प्रकाशित होती रहती है। लेकिन लालाजी को पढ़ने के लिए तो मैं तरस जाता हूं। इसीलिए मैंने राजीव से कहा कि जब हम लालाजी  के करीब थे तब ही तुमने क्यों नहीं कहा कि चलों हम लालाजी को जान लेते हैं। पढ़कर नहीं तो सुनकर ही सही, लालाजी का फायदा हम उठा सकते थे। लेकिन तब हमने ऐसा नहीं किया। 
मैं छत्तीसगढ़ सरकार की एक वेबसाइट देख रहा था। उसमें लालाजी को अभावग्रस्त कलाकारों की सूची में रखा गया है और बताया गया है कि उन्हें सरकार पेंशन देती है। कुछ सम्मानों की सूची में भी उनका नाम है। सरकार इस सूची में लालाजी का नाम डाल कर धन्य हो रही होगी। राजीव जब साक्षात्कार लेकर देहरादून लौट रहा था तब रायपुर में उससे मेरी भी मुलाकात हुई थी। साक्षात्कार उसने मुझे दिखाया था, मैंने उसे तुरंत बधाई भी दी थी। राजीव को छटपटाहट थी कि सरकारें लालाजी के लिए कुछ करती क्यों नहीं। उसके देहरादून लौट जाने के बाद भी हम इस पर फोन पर बातें करते रहे। राजीव का कहना था कि लालाजी को अब तक कोई ऐसा बड़ा सम्मान नहीं मिल पाया, जिसके वे अधिकारी हैं। लालाजी के हम श्रद्धालुओं को इसके लिए कोई मुहिम चलानी चाहिए। फिर हमने सोचा कि कौन-सा बड़ा सम्मान। हमने एक पलड़े में लालाजी को रखा, दूसरे में एक-एक कर कई सम्मानों को। लालाजी भारी पड़े। तौल बराबर ही नहीं हुई। तो तय हुआ कि मुहिम-फुहिम का कोई अर्थ नहीं। तब भी राजीव ने फोन पर छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग के किसी अफसर से पूछ डाला-लालाजी के लिए सरकार कुछ करती क्यों नहीं। राजीव ने मुझे बताया कि उस अफसर ने कहा कि लालाजी के साथ बड़ी दिक्कत है। उन्हें किसी तरह का प्रस्ताव भेजो तो उस प्रस्ताव की पीठ पर टिकटें चिपका कर लौटती डाक से सधन्यवाद भेज देते हैं। 
संजीव भाई, राजीव को लिखी  चिट्ठी में मैंने लिखा है-लालाजी भूखे जरूर हो सकते हैं, पर हाथ नहीं पसारेंगे। मुझे लगता है कि दिक्कत लालाजी में नहीं है, हममें हैं। हम उस स्वाभिमानी आदमी के पास दाता की मुद्रा में जाते हैं, ग्राही की मुद्रा में नहीं। हम उनसे मांगेंगे तो उन्हें मिल जाएगा। अफसर ने राजीव से कहा था कि लालाजी की रचनाएं भी तभी छापी जा सकती हैं जब उन्हें हासिल करने के लिए लालाजी के भरोसे का कोई आदमी मध्यस्थ हो। घटनाओं में कैसा विरोधाभाष है संजीव भाई, मैं जानता हूं कि राजीव से लालाजी की नियमित मुलाकात नहीं है। वह बरसों बाद उनसे मिला। बरसों पहले अवश्य निरंतरता रही होगी। इतने सालों बाद राजीव ने लालाजी के सामने हाथ पसारा तो 91 साल की उम्र में लालाजी ने न सिर्फ हस्तलिखित साक्षात्कार दिया, बल्कि  अपनी कई रचनाएं भी उसे सौंप दी। कहा इसका जैसा चाहे वैसा उपयोग करो। राजीव ने तो साहित्य शिल्पी में इन रचनाओं को एक-एक कर छापना शुरू कर दिया है। राजीव से बहुत हद तक लालाजी की अजनबियत के बावजूद उन्होंने उसे बहुत कुछ दिया। राजीव याचक था। बहुत से लोग ऐसे भी रहे जिन्हें लालाजी बहुत अच्छी तरह जानते-पहचानते हैं, उनके साहित्यिक फर्जीवाड़े की प्रवृत्तियों को खूब समझते हैं। वे लोग भी जब-जब याचक बने लालाजी ने दिया। सरकार दाता बनकर लालाजी को आवाज लगाएगी तो दिक्कत तो होगी ही। लालाजी की रचनाएं प्रकाशित हो, लालाजी समग्र नाम का कोई ग्रंथ हो, ऐसी कल्पना करता हूं। 
यानी मैं लालाजी को समग्र रूप से जानना चाहता हूं। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. केवल भाई, आपनें लालाजी के प्रति आपकी श्रद्धा एवं अपनी भावनाओं को इस पत्र के हृदय से व्‍यक्‍त किया है, आपके सभी बातों से मैं सहमत हूं, लालाजी की समग्र कृतियों की ग्रंथावली सरकारी या निजी सहयोग से निकलनी चाहिए, मिमियाती जिन्‍दगी जैसी लालाजी की लेखनी यत्र-तत्र बिखरी हुई है, उनकी अप्रकाशित व प्रकाशित लेखनी को सर्वप्रथम एकत्रित करना आवश्‍यक है, इसके लिये जगदलपुर के ही किसी भावुक हृदय की आवश्‍यकता है। जगदलपुर के लालाजी के समकालीन साहित्‍यानुरागियों यथा श्री हरिहर वैष्‍णव जी, शानी जी के वारिसान एवं डॉ.धनंजय वर्मा जी से भी इसके लिये सहयोग लेना होगा। लालाजी के सानिध्‍य में आये साहित्‍यप्रेमी मध्‍य प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारियों व पत्रकारों से भी इसके लिये सहयोग लेनी होगी। डॉ.बरसैंया व राम अधीर जैसे बस्‍तर से दूर बैठे छत्‍तीसगढि़यों की सुधि लेने वालों से भी संपर्क करना होगा। यह कार्य यदि सरकार चाहे तो बेहतर ढ़ग से हो सकती है, हमारे प्रदेश में ही हमसे बेहतर सोंचने वाले लोग हैं। संस्‍कृति विभाग में श्री राहुल सिंह जी से भी इस संबंध में सार्थक चर्चा हो सकती है, श्री अशोक बजाज जी से चर्चा कर प्रदेश की राजनैतिक इच्‍छाशक्ति को दिशा दी जा सकती है, ब्‍लॉग जगत में ही सक्रिय स्‍वराज्‍यकुमार जी से भी दिशा निर्देश ली जा सकती है।
    आपने एवं राजीव जी नें इस दिशा में जो कदम बढ़ाया है उसके लिये आप दोनों को साधुवाद. पहल आरंभ हो .....

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  2. Pahal aarambh ho gayii hai 2005 se. Gati manthar thii kintu idhar yah tiiwra huii hai; aur isake liye aadarniiy Raajiiv Ranjan jii, aadareniiya sanjiiv tiwaarii jii, aadarniiy kewal krishna jii kaa aabhaar.
    Shraddhey laalaa jii kii do aprakaashit pandulipiyon (1-Muktak laalaa jagdalpurii ke, aur 2-Giit-dhanwaa)ke prakashan ke saath-saath unake wyaktitwa avam krititwa par bhii kaam chal rahaa hai. Sabhii se sahyog kii praarthanaa hai. Jinake paas bhii laalaa jii se sambandhit saamagrii (sansmaran, saakshaatkaar aadi) uplabdh ho unase wah saamagrii mujhe uplabdh karaane kaa winamra niwedan hai. Main unakaa aajiiwan aabhaarii rahuungaa.
    Harihar Vaishnav
    Sargipalpara,
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