गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

ये पत्रकार अलग तरीकों से कीमत वसूलना जानते हैं

पंकज कुमार झा
पंकज झा
बात करीब तीन साल पुरानी है. अपने एक पत्रकार मित्र के माध्यम से एक लड़की से रायपुर में मिलना हुआ. परिचय के क्रम में पता चला कि किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में वो रायपुर में है और बस्तर अंचल में काम करना उसका ध्येय है. जल्द ही यह पता चला कि उसकी कम्पनी का नाम भले ही अलग हो, लेकिन मोटे तौर पर वह टाटा के लिए काम करती है. बकौल उस लड़की उसकी कम्पनी देश का सबसे बड़ा पीआर ऑर्गेनाइजेशन है.
हालांकि जल्द ही हम दोनों को ये पता चल गया कि हम दोनों ही एक दूसरे के किसी काम के नहीं है. उसकी अपने से एक सामान्य अपेक्षा यह थी कि यहां के पत्रकारों-संपादकों से उसका परिचय कराऊं और टाटा के लोहंडीगुडा संयंत्र की कुछ ‘सकारात्मक’ खबरे छपाने में उसकी मदद करूं. थोडा-सा अनौपचारिक होने पर इस लेखक ने बिल्कुल यही सोचा कि भले ही मिलना-जुलना आप मित्रतावश ही करें, लेकिन कोई भी व्यक्ति इस बात का भरोसा नहीं करेगा कि बिना किसी आर्थिक स्वार्थ के कोई टाटा के लिए सिफारिश करेगा. बात आयी-गयी हो गयी. बाद में कुछ पत्रकारों को अपनी ‘स्टोरी’ की कीमत वसूलते, टाटानगर तक जा ऐश करते भी इस लेखक ने खूब देखा. खैर..उसको खुदा मिले हैं खुदा की जिसे तलाश...!
तो अब जब देश के करोड़ों लोग वैष्णवी कम्युनिकेशन और उसकी मालिक देश की सबसे बड़ी दलाल नीरा राडिया के बारे में जान कर हतप्रभ हैं तो मात्र एक सवाल जेहन में आ रहा है कि जो बात अपने जैसे सामान्य व्यक्ति की समझ में आ गया था (कि टाटा के लिए काम करने वाली किसी एजेंसी की  वकालत करके आप पाक साफ़ तो बिलकुल नहीं दिख सकते) क्या वह बरखा दत्त जैसी आइकान को नहीं मालूम रहा होगा. आज जब बरखा अपनी बातचीत को ‘खबर’ प्राप्त करने की एक सामान्य प्रक्रिया कह रही है, खुद ये भी स्वीकार कर रही है कि नीरा से उसने झूठ बोला था तो उस पर तरस ही खाया जा सकता था. हालाकि अन्य लोगों के विचारों के उलट हम यह बिलकुल नहीं मानते हैं कि बरखा दत्त, वीर संघवी, प्रभु चावला जैसे लोगों ने नागरिकों का भरोसा तोड़ा है. देश के युवा अगर इन हस्तियों को अपना आदर्श मानते थे (या हैं भी ) तो कम से कम इसलिए तो बिल्‍कुल नहीं कि इन पत्रकारों में वो माखनलाल चतुर्वेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, माधवराव सप्रे या चंदूलाल चंद्राकर की आत्मा देखते थे. युवाओं के आदर्श ये इसलिए हैं कि आज का हर युवा उन्हीं की तरह का लाइफस्टाइल वैसी ही जिंदगी जीना चाहता है, वैसा ही रौब और दाब चाहता है. सब को यह बेहतर पता है कि सत्ता की नजदीकियों, धनकुबेरों के सानिध्य को यूं ही जाया करने की बेवकूफी कोई नहीं करता. सब अलग-अलग तरीके से कीमत वसूलना जानते है. उनकी बुद्धिमता का मतलब ही यही है कि किस तरह अपने सात पुश्तों के लिए अय्याशी का सामन इकठ्ठा कर लिया जाए. अभी आए टेप प्रकरण में, जिसकी कई परतें अभी खुलनी बाकी है.
गौर करने लायक बात यह है कि केवल नीरा राडिया का फोन टैप किया गया है. अगर जिन-जिन से उसकी बात हुई उन लोगों का फोन टैप किया जाता तब पता चलता कि ऐसे कितनी दलाल देश में भरे पड़े हैं और इन दलालों की दलाली कर क्या-क्या पाया है पत्रकारों ने. खैर, तो दिक्कत इन लोगों से बिल्कुल नहीं है. जब तक देश के भ्रष्ट तंत्र में कोई आमूलचूल एवं क्रांतिकारी परिवर्तन न लाया जाय, जब तक हज़ारों करोड़ रूपये हड़प लेने वाले लोगों को सौ रुपया काट लेने वाले जेबकतरे जितना भी दंड नहीं मिले, तब-तक तो यह सब यूं ही चलता रहेगा. आर्थिक अपराध का रूप बदलता रहेगा. दलालों के दुस्साहस में इजाफा होता रहेगा. अभी तक मंत्रियों से पहचान की बदौलत काम करवा लेने वाले लोग अब मंत्रियों को विभाग तक आवंटित कराने की औकात में आ गए हैं. पता नहीं आगे और क्या-क्या हो सकता है. तो पूरे कुंए में ही भांग पड़ी है. साथ ही लोग अब इस ‘नशे’ के अभ्यस्त भी हो गए हैं. जो सिस्टम के अंदर है वह मज़ा मार रहा है जो बाहर है वो भी सिस्टम की खिलाफत को भी अपना पेशा बनाए हुए है. किसी फिल्म के कलाकार की तरह जहां नायक और खलनायक सबको मेहनताना मिलना ही है. दिक्कत तो तब है जब देश को चूस कर अपना साम्राज्य खड़ा करने वाले लोग खुद को पाक-साफ़ करार देकर दूसरों को भ्रष्ट बताना चाहते हैं. गोया इस हमाम में वो अपना ‘काला गाउन’ पहन कर ही गए हों.
टेप लीक होने से ऐन पहले रतन टाटा ने बिना संदर्भ के यह ‘रहस्योद्घाटन’ किया था कि वह एक मंत्री को पन्द्रह करोड़ रिश्वत नहीं देने के कारण अपना एयरलाइन शुरू नहीं कर पाए. एक देवदूत की तरह उन्होंने झट से ये भी प्रवचन दे डाला कि अगर वो घूस दे देते तो रात को सो नहीं पाते. उस भाषण के बाद टाटा की ठकुरसुहाती करने में बढ़-चढ़ कर लोगों ने अपना योगदान दिया. अपना सारा गाम्भीर्य और गरिमा ताक पर रख कर एक सरस्वती पुत्र कहे जाने वाले स्तंभकार ने तो शीर्षक ही दिया कि ‘टाटा की ईमानदारी के आगे सारा देश नतमस्तक.’ लेकिन जल्द ही लोगों को पता चल गया कि खुद को पाक-साफ़ बताने का कारण यह टेप ही था, जिसके लीक होने की जानकारी शायद उनको मिल गयी थी. अन्यथा इस तरह का संयोग बिल्कुल नहीं हो सकता कि आप बयान दें और एक सप्ताह के बाद रंगीनमिजाजी के साथ किया गया आपका सौदा जगजाहिर हो जाए. जिसने भी टाटा और राडिया की बातचीत पढ़ी या सुनी हो, वह बेहतर समझ सकता है कि केवल एक राजा को मंत्री बनाने में कितना बड़ा स्वार्थ था टाटा समूह का. हर तरह के सलाह या एजेंसियों की चेतावनी को दरकिनार कर राजा ने टाटा नमक का क़र्ज़ अदा किया. उसकी कम्पनी को 2 जी स्पेक्ट्रम 1658 करोड़ में आवंटित हुआ और अगले ही दिन इस सौदे का 27 प्रतिशत हिस्सा जापान की डोकोमो कम्पनी को 12,924 करोड़ की कीमत पर बेच दिया गया. ध्यान देने वाली बात यह है कि इस सौदे में केवल पैंतालीस मिनट का समय लगा. भाग लेने की इच्छुक कंपनियों को इतने ही समय में 1658 करोड़ का ड्राफ्ट एवं करीब दर्ज़न भर विभागों से अनापत्ति प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना था.
ज़ाहिर है जिन कंपनियों को सब कुछ मालूम होता वही इस बोली में हिस्सा ले सकते थे. तो केवल इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि देश के खजाने को हज़ारों करोड़ की चपत लगाने वाले इस साज़िश के लिए कितनी तैयारी की गयी होगी. और इस सौदे से सबसे बड़ा फायदा उठाने वाला व्यक्ति यदि ईमानदारी का ढिंढोरा पिटे तो इस दुस्साहस को क्या कहें, लेकिन शिकायत इन किसी से नहीं है. किसी भी आम नागरिक को आज यह अच्छी तरह मालूम है कि परदे के पीछे खेले जाने वाले खेल के बिना कोई इस तरह अरबों-खरबों का मालिक हो ही नहीं सकता. आज तो उद्योग लगाना काफी कुछ आसान कर दिया गया है, लेकिन आप तब की सोचिये जब एक छोटी  फैक्ट्री लगाने के लिए भी विभिन्न विभागों से कुल 72 अनापत्ति पत्र लेना होता था. तो जिस देश में मृत्यु प्रमाण पत्र लेने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती हो वहां कोई इस तरह पूरे ईमानदारी के साथ अपना व्यवसाय चला सकता है?
खैर, चूंकि  यह दौर प्रतिमाओं के भंजन का है तो सवाल केवल सबसे ईमानदार माने जाने वाले, देश के मुखिया का है. अगर प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई सबूत अभी तक नहीं मिलने के कारण आप उनको ईमानदार मान भी लें, तो क्या इतिहास उन्हें इसलिए माफ कर देगा कि जब देश को बुरी तरह लूटा-खसोटा जा रहा था, बात चाहे कोमनवेल्थ घोटाले की हो, महंगाई घोटाले या फिर इस स्पेक्ट्रम घोटाले या दलाली की, कुर्सी से चिपक कर रहने मात्र के लोभ से देश को गर्त में जाते देख कर भी चुप रहने वाले मुखिया को आप ईमानदार कह सकते हैं? क्या कुर्सी लिप्सा का इससे बड़ा भ्रष्टाचार और कोई हो सकता है? प्रधानमंत्री जी, हालिया घटनाक्रम पर मुझे शाहजहां की याद आ रही है जो शासक होते हुए भी कहता था, ‘शेर भर शराब हो, पाव भर कबाब हो, नूरे जहां की सल्तनत खूब हो खराब हो.’ आप भी भले ही एक नयी नूर-ए-जहां  को अपना सब कुछ सौंप कर कुर्सी पर आनंद मना रहे हों, लेकिन जब वक्त आपसे भी गिन-गिन कर आपके आपराधिक तटस्थता का हिसाब मांगेगा, जब इतिहास का औरंगजेब आपको भी सवालों के काल कोठरी में कैद करेगा तब शाहजहां की तरह झरोखे से देख लेने को कोई ताजमहल भी आपसे पास नहीं रहेगा. दिनकर ने तो पहले ही घोषणा कर रखी है ‘जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी अपराध.'
लेखक पंकज कुमार झा रायपुर से प्रकाशित 'दीप कमल' के संपादक हैं.
(भड़ास 4 मीडिया से साभार)

2 टिप्‍पणियां:

  1. रहस्य के परदे उठाती पोस्ट है | आपका चिंतन गम्भीर है किसी भी विषय पर निष्पक्ष रहते हुए अपनी बात कहना आज के समय में बहुत बड़ी बात है | आपकी लेखनी को नमन |

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  2. बहुत बढिया रहस्य से परदा उठाने के लिए साधुवाद।

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