बुधवार, 11 जनवरी 2017
मंगलवार, 3 जनवरी 2017
शब्द
शब्दकोषों
में
कहां
है इतनी जगह
कि
समेट लें
शब्दों
के सारे के सारे अर्थ।
शब्द,
ध्वनियों का समुच्चय भर कहां?
ध्वनियों
के अंतराल में भी तो-
धड़कते
हैं खामोश अर्थों के साथ।
और
बांचे जाते हैं
बिना
कहे, बिना सुने
शब्दकोषों
में
इतनी
जगह कहां
कि
समेट ले
अनंत
ब्रह्मांड की गहराईयों में तिरते
धड़कते
हुए शब्दों के
सारे
के सारे खामोश अर्थ।
-केवलकृष्ण
शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016
कंचे
तब
जब झुलसती धूप वाले-
दिन बीत चुके थे,
पड़ने लगी थी बारिश की फुहारें,
मुरम के उस लाल मैदान ने-
बदल लिया था रंग,
और एक मखमली कीड़े ने
शुरू कर दिया था रेंगना-
हरी हरी घांस पर।
जब झुलसती धूप वाले-
दिन बीत चुके थे,
पड़ने लगी थी बारिश की फुहारें,
मुरम के उस लाल मैदान ने-
बदल लिया था रंग,
और एक मखमली कीड़े ने
शुरू कर दिया था रेंगना-
हरी हरी घांस पर।
तब
जब कुछ बीज अंकुरित हो रहे थे
फूट रही थी कुछ पत्तियां
भींच रखे थे मैंने अपनी मुठ्ठियों में
कुछ कंचे, जो तुमने मुझे दिए थे
जो अमानत थे तुम्हारी
और जिन्हें तुम्हें लौटाने के लिए वचनबद्ध था मैं।
जब कुछ बीज अंकुरित हो रहे थे
फूट रही थी कुछ पत्तियां
भींच रखे थे मैंने अपनी मुठ्ठियों में
कुछ कंचे, जो तुमने मुझे दिए थे
जो अमानत थे तुम्हारी
और जिन्हें तुम्हें लौटाने के लिए वचनबद्ध था मैं।
तब
जब पड़ रही थी बारिश की फुहारें
हरिया रहा था मुरम का लाल मैदान
मेरे भीतर की हरितिमा-
तप्त हुई जा रही थी, तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा में।
भींची हुई मुट्ठियों को खोलकर
देखा था मैने तुम्हारी अमानतों को
फिर वहीं पर,
अंकुरित होते एक बीज के करीब,
बो दिया था उन्हें।
जब पड़ रही थी बारिश की फुहारें
हरिया रहा था मुरम का लाल मैदान
मेरे भीतर की हरितिमा-
तप्त हुई जा रही थी, तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा में।
भींची हुई मुट्ठियों को खोलकर
देखा था मैने तुम्हारी अमानतों को
फिर वहीं पर,
अंकुरित होते एक बीज के करीब,
बो दिया था उन्हें।
तुम नहीं लौटीं
मैदान पर ऊग आए हैं घर
उन्हीं में से एक में
ऊग आया हूं मैं
उन्हीं में से एक में
शायद कभी ऊग आओ तुम भी।
कंचे फूल रहे हैं।
मैदान पर ऊग आए हैं घर
उन्हीं में से एक में
ऊग आया हूं मैं
उन्हीं में से एक में
शायद कभी ऊग आओ तुम भी।
कंचे फूल रहे हैं।
-केवलकृष्ण
मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016
शनिवार, 15 अक्टूबर 2016
शनिवार, 31 मई 2014
जो हालांकि होते हैं, पर नजर नहीं आते
जब अत्याचारी हो जाए सूरज
सूख जाएं नदियां
वीरान हो जाए धरती
और लगे कि सब कुछ खत्म हो गया
तब तुम
उन बीजों के बारे में सोचना
जो हालांकि होते हैं,
पर नजर नहीं आते।
उस बारिश के बारे में सोचना
जो होनी ही है,
किसी न किसी रोज।
और सोचना अपने बारे में।
अपनी जिंदा उम्मीदों के बारे में।
सूख जाएं नदियां
वीरान हो जाए धरती
और लगे कि सब कुछ खत्म हो गया
तब तुम
उन बीजों के बारे में सोचना
जो हालांकि होते हैं,
पर नजर नहीं आते।
उस बारिश के बारे में सोचना
जो होनी ही है,
किसी न किसी रोज।
और सोचना अपने बारे में।
अपनी जिंदा उम्मीदों के बारे में।
-केवलकृष्ण
रविवार, 11 मई 2014
साक्षात्कार
कितना अजीब लगता हैआइने के सामने खड़े होकर
यह सोचना
कि ये चेहरा
कितना जाना पहचाना सा है.
अपनी ही गली में
खड़े होकर सोचना
कि शायद गुजरा हूं मैं भी कभी
यहीं से।
अपनी ही कविताओं को
किसी और की महसूस कर
बांचना।
अपने ही शब्दों को
अजनबी कर देना खुद से।
कितना अजीब लगता है
खुद से जुदा होकर
खुद का साक्षात्कार करना।
-केवलकृष्ण
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