बुधवार, 9 नवंबर 2011

नीली धूल के पहाड़ पर

नीली धूल के पहाड़ पर
सबकुछ नीला
इतना नीला कि
काला-काला सा।
एक सफेद-
तुम्हारा पसीना
एक सफेद-
मुस्कुराहट तुम्हारी


नीली धूल के पहाड़ पर
बेरंग आसमान
चमचम चमचम एक सूरज
पीली-पीली चट्ट-चट्ट धूप
ठंडा है तो बस
तुंबी का पानी।


नीली धूल में
कित्ता लोहा
इत्ता लोहा कि
पट जाए सारी धरती
बच जाए तो बस
हृदय तुम्हारा।


नीली धूल में
कितने फूल
बस उतने ही
जितने खोंच रखे हैं तुमने
कानों में।


नीली धूल में
कितना बारूद
इतना बारूद कि
चिथड़ी हो जाए जिंदगी
नीली धूल में किनका बारूद
उनका बारूद
उन-उन सबका बारूद
जो कहते हैं-
हम हैं साथ तुम्हारे।


-केवलकृष्ण


नीली धूल-बस्तर के आखिरी छोर पर बैलाडीला की लौह खदानों से निकलने वाला फाइन ओर। उत्तमकोटि का अयस्क। इसे ब्लू डस्ट भी कहते हैं। यानी नीली धूल। यहां प्रतीकात्मक रूप में नीली धूल का पहाड़-बस्तर, केंद्रीय पात्र-बस्तरिया।
 इस कविता के बारे में-मेरे पुराने मित्र और ब्लागर राजीवरंजन बैलाडीला जाते हुए रायपुर में रुके। राजीव और मुझे बस्तर छोड़े जमाना बीत गया। फिलहाल वे देहरादून में है, मैं रायपुर में। हमारा बचपन बैलाडीला में साथ-साथ बीता। हमने अपनी स्मृति के बस्तर की सैर की। पाया कि ये बस्तर उस बस्तर जैसा तो बिलकुल नहीं है। बस्तरिया की जिंदगी में अब बारूद ही बारूद है। बस्तर में शांति की स्थापना की दुआ के साथ यह कविता। राजीव को आभार सहित। इस बारूद के खाद में बदलने की कामना के साथ।

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