शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

घर के पिछवाड़े में रोज धमाका होता है

पहाड़ मेरे घर के पिछवाड़े से शुरू होता
और फिर
कुंडली मारता हुआ
सामने से निकल जाता
बहुत दूर

पहाड़ की कुंडली में
एक अंडे की तरह था मेरा घर
पहाड़ बनने की संभावनाओं से भरपूर

उफ, वह अदभुत अनुभूतियां
अदभुत नगरी,
अदभुत लोग
शहर के दरवाजे पर
बैठा था विशाल सांड
यह सांड भी, वही पहाड़
बैलाडीला

डीले में लोहा
लोहा ही लोहा
कितना लोहा, क्या पता
बस खोदे जा रहे हैं लोग
कुदालों से, फावड़ों से और अब बारूदों से

जब विस्फोट होता तो थर्रा उठती पहाड़ी
घर के पिछवाड़े से होता हुआ आगे दूर तक
अंडा भी थोड़ा डोल जाता
भीतर बैठा मैं
अंदाज लगाता कि पहाड़
आज और कितना टूट गया होगा

पहाड़ पर आंवले के पेड़ थे
मीठे आमों के, चार-तेंदू के
वहां शेर थे, भालू थे
और शिकार पर निकले आदिवासी

ध्वस्त होते पहाड़ों पर
इतनी हरियाली थी कि
हजार-हजार आंखों में समाकर
बच जाती थी ज्यों की त्यों

बारिश के दिनों में
बादल उतर आते थे
बिलकुल नीचे, तलहटी तक
कई बार बादलों में पहाड़ ऐसा गुम हो जाता
जैसे एक जादूगर न गायब कर दी थी पूरी ट्रेन

बादल लाख गड़गड़ाए
पहाड़ टूटे नहीं
बादलों के पास नहीं था बारूद
और न ही थी, पहाड़ को ध्वस्त करने की कला
शायद बादलों को पता नहीं था
कि पहाड़ में कित्ता लोहा है

पता भी होता
तो वे लोहे का करते क्या
न तलवारें बनानी थी,  न टैंक
न रेल दौड़ानी थी, न बिजली
बादल तो बादल ही थे
लड़ते जरूर थे, पर निहत्थे
और फिर गले भी मिल जाते
बरसते थे जमकर
धरती हरिया जाती थी

2 टिप्‍पणियां:

  1. धरती के प्रति आपकी चिंता जायज है सार्थक पोस्ट आभार

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  2. पता भी होता
    तो वे लोहे का करते क्या
    न तलवारें बनानी थी, न टैंक
    न रेल दौड़ानी थी, न बिजली
    बादल तो बादल ही थे
    लड़ते जरूर थे, पर निहत्थे
    और फिर गले भी मिल जाते
    बरसते थे जमकर
    धरती हरिया जाती थी

    बहुत कुछ कहती हुई कविता।

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