वो एक रंगकर्मी था। भावनाओं और संवेदनाओं का बड़ा कद्रदान। एक खूबसूरत दुनिया का वह ख्वाब देखा करता था। एक ऐसी दुनिया जो प्रेम से लबालब हो। उसने खुद की जिंदगी के लिए भी एक ख्वाब देखा। एक छोटे से परिवार का ख्वाब। एक ऐसी हमसफर का ख्वाब जो रसोई से लेकर थिएटर तक उसकी हमकदम हो। जिसके ख्वाब उसके ख्वाबों जैसे हों। खूबसूरत दुनिया को रचने में जो उसकी मददगार हो। उसने अपने परिवार में एक छोटी सी बिटिया की कल्पना की थी। जिसे वह ऐसे संस्कार देना चाहता था, जैसे संस्कारों की जरूरत इस दुनिया को है। लेकिन जब हकीकत का सामना हुआ तो जिंदगी नर्क हो गई। शादी एक ऐसी लड़की से हुई, जिसके लिए न तो कला का कोई अर्थ था और न ही दुनिया को खूबसूरत बनाने के जुनून से उसे कोई मतलब था। उसके लिए नारी होने का अर्थ वैसा नहीं था, जैसा वह कलाकार सोचता था। वह तो अपना अलग अस्तीत्व चाहती थी, अलग पहचान। उसके लिए मां बनने का भी कोई अर्थ नहीं था और ऐसे पचड़ों में वह पड़ना नहीं चाहती थी। वही हुआ जो होना था, खटपट बढ़ती गई। एक दिन दोनों के रास्ते अलग हो गए।
कलाकार जिंदगी से निराश नहीं था। हालात से परेशान जरूर था। परेशानी के इन्हीं दिनों में एक महिला मित्र ने उसकी भवनाओं को सहलाया। निकटता बढ़ी तो कलाकार को लगा कि यही वह किरदार है जिसकी तलाश उसे अपनी जिंदगी के लिए थी। दोनों ने तय किया और शादी कर ली। कलाकार की कल्पनाशीलता को पर लग गए। अब तो रंगमंच से घर तक हमकदम साथ थी। अब तो खूब नाटक खेले जा सकते थे। नाश्ते की टेबल पर स्क्रीप्ट पर चर्चा हो सकती थी। घूमते-टहलते संवादों की डिजाइनिंग की जा सकती थी। तो जिंदगी रिहर्सल में बीतने लगी। नयी बीबी अब उसके नाटक की अभिनेत्री थी और खुद निर्देशक। रिहर्सल, रिहर्सल और रिहर्सल। कलाकार खुश था, बहुत खुश। यह खुशी तब और बढ़ गई जब उसे एक और दोस्त मिल गया। यह शख्स थिएटर से वास्ता तो नहीं रखता था, लेकिन कलाकारों की खूब इज्जत करता था। कलाकार, उसकी बीबी और उनका नया दोस्त जिंदगी के ज्यादातर लम्हों में साथ होते। नये दोस्त के आ जाने से नयी बीबी को भी जिंदगी में कुछ नया पन महसूस होने लगा। नाटकों के घिसे-पिटे संवादों की जगह असल जिंदगी के नये और ताजे संवाद सुनने को मिले तो सुकून मिला। नये दोस्त के इंद्रधनुषी जीवन के कितने ही रंग नयी बीबी के ख्वाबों में घुलने लगे। उसे लगने लगा कि नाटकों की नकली जिंदगी से बेहतर है कि असल जिंदगी के असल पलों का मजा लूटा जाए। एक रोज वह उस कलाकार को छोड़कर अपने नये साथी के साथ हो ली।
नयी बीबी और उसके नये साथी की जिंदगी मजेदार थी। दोनों को वह सब कुछ मिला जो वे चाहते थे। समय बीता। समय के साथ-साथ नये दोस्त को महसूस हुआ कि कलाकार अब भी उन दोनों के बीच मौजूद है। नयी बीबी अपने पति को भूल नहीं पा रही। जिंदगी में सबकुछ पाकर भी वह उदास है। नया दोस्त उदार नजरिये का था। उसने उससे कह दिया कि यदि ऐसा है तो वह कभी भी पुराने पति के पास लौट सकती है, उसे कतई बुरा नहीं लगेगा।
---------------
रायपुर में इन दिनों मुक्तिबोध नाट्य समारोह चल रहा है। एक नाटक देखकर आए एक दोस्त ने संक्षिप्त कथानक सुनाया था। कथानक सुनने के बाद रिश्तों, सपनों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानव अधिकार, नारी स्वतंत्रता, मर्दना तानाशाही जैसे शब्दों के बीच उलझा हुआ हूं। हो सकता है कि नाटक में इन शब्दों की विस्तृत व्याख्या की गई हो, लेकिन मैं वंचित रह गया। क्या आप इनकी व्याख्या कर मेरी मदद कर पाएंगे। (नाटक का नाम शायद कच्चे लम्हे था, और शायद इसे गुलजार ने लिखा है)
मंगलवार, 16 नवंबर 2010
सोमवार, 8 नवंबर 2010
एक प्रश्न
बीबीसी में खबर है कि बराक ओबामा की यात्रा के विरोध में माओवादियों ने बंद का आयोजन किया और जमकर तोड़फोड़ मचाई। कई जगहों पर रेल पटरियों पर विस्फोट किए। बात अपने समझ में नहीं आई। इसमें बराक ओबामा का क्या गया।
रविवार, 7 नवंबर 2010
देखिए न हुजूर
देखिए न हुजूर
कितना मारा है
इधर देखिए हमारी पीठ
जांघों पर ये लाल निशान
जबड़ा ही तोड़ डाला कंबख्तों ने
पूरी की पूरी बत्तीसी हिला डाली
देखिए न हुजूर....
कुछ कीजिए आका
बस आपका ही आसरा
जी,
जी, हो जाएगा हुजुर
किधर किधर दस्तख्त मारे बताइए
बिजनेस आप ही करेंगे, शपथ
थैंक्यू सर
आप आए हम निहाल हैं
कहें तो स्वागत में अपनी चमड़ी ही बिछा दें
आपकी दोस्ती के लिए थैंक्यू सर
पर देखिए हुजूर
हम तो बोल भी नहीं पा रहे
बहुत मारा है हुजूर
जबड़ा तक सुजा डाला
पीठ देखिए न हुजूर
जांघे
गुरुवार, 4 नवंबर 2010
जरा इधर भी: जल रहे जज्बात
जरा इधर भी: जल रहे जज्बात: " शब्द मायूस हैं संवेदनाएं खामोश जज्बातों के खंडहर में फड़फड़ा रही है अभिव्यक्ति ये कैसा समय है दोस्तों कि हम और तुम बहुत कुछ कहना चाह रहे ह..."
बुधवार, 3 नवंबर 2010
जल रहे जज्बात
शब्द मायूस हैं
संवेदनाएं खामोश
जज्बातों के खंडहर में
फड़फड़ा रही है अभिव्यक्ति
ये कैसा समय है दोस्तों
कि हम और तुम
बहुत कुछ कहना चाह रहे हैं
और कुछ भी कह नहीं पा रहे
कितनी गर्म है हवाएं
और कितनी भयंकर ये रात
सूरज कैद है
दुश्मनों की हवेली में
पर जरा ठहरो. . .
उधर वो उजियाला कैसा
वो लहराता उजियाला
वही वो मद्दिम-मद्दिम सा
कुछ जल रहा है वहां
अरे!!
ये तो जज्बात हैं
हमारे तुम्हारे
ये तो फड़फड़ाती अभिव्यक्ति है
हमारी तुम्हारी
. . . . . तो रोशनी की उम्मीद
अभी बाकी है दोस्तों!!
-केवल कृष्ण
जज्बातों के खंडहर में
फड़फड़ा रही है अभिव्यक्ति
ये कैसा समय है दोस्तों
कि हम और तुम
बहुत कुछ कहना चाह रहे हैं
और कुछ भी कह नहीं पा रहे
कितनी गर्म है हवाएं
और कितनी भयंकर ये रात
सूरज कैद है
दुश्मनों की हवेली में
पर जरा ठहरो. . .
उधर वो उजियाला कैसा
वो लहराता उजियाला
वही वो मद्दिम-मद्दिम सा
कुछ जल रहा है वहां
अरे!!
ये तो जज्बात हैं
हमारे तुम्हारे
ये तो फड़फड़ाती अभिव्यक्ति है
हमारी तुम्हारी
. . . . . तो रोशनी की उम्मीद
अभी बाकी है दोस्तों!!
-केवल कृष्ण
सोमवार, 1 नवंबर 2010
... छोड़ो ये ना सोचो
सोचता हूं कुछ लिखूं
क्या लिखूं
लिखने से पहले सोचना बहुत जरूरी होगा शायद
और सोचना तो बरसों पहले ही छोड़ दिया है मैंने
सोचता कौन है
वही, जो जिंदा रहता है
यानी सोचने के लिए आदमी का जिंदा रहना पहली शर्त है
ठहरिए, मैं खुद को पहले टटोल लूं
क्या इतने दिनों तक सोचे बिना जिंदा हूं मैं
इधर कुछ धड़-धड़ कर रहा है
ध्यान से सुनता हूं तो सांसों की भी आवाज आती है
हाथ-पांव हिल तो रहे हैं, हंस तो रहा हूं, रो तो रहा हूं
यानी जिंदा हूं मैं
तो निष्कर्ष यह कि बिना सोचे भी जिंदा रह सकते हैं हम
तब सोचना ही क्यों
पहले जब सोचता था
याद है, सोचते हुए बहुत तकलीफ होती थी
तब सोचता था कि लोग मेरी तरह सोचते क्यों नहीं
जितना सोचता उतनी ही तकलीफ होती
सोचा, दूसरों की तरह सोचना छोड़ क्यों न दिया जाए
तो मैने सोचना छोड़ दिया
सच पूछिए, न सोचते हुए बड़ा सुकून मिला
मेरी आंखें खुली हुईं थीं
दिमाग बंद
जब नक्सलियों ने 76 जानें लीं, मैंने नहीं सोचा
पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ किए मैंने नहीं सोचा
कारखाने की चिमनी भरभरा कर गिरी
दफ्न हो गए सैकड़ों मजदूर
पखांजूर में गरीब की लाश कुत्तों ने नोच ली
नारायणपुर में चंद्रू का घर बारिश में बह गया
सलमान खान ने यहां-वहां छेद डाला
मैंने नहीं सोचा, देखा जरूर
अरुंधती का बयान देखा
कलमाड़ी का जादू देखा
देखा कि मेरा राज्य कितनी तरक्की कर रहा है
शहर की सरहद पसर रही है
खेत गायब हो रहे हैं
जमीन बेचकर किसान मोटर साइकिलों में फर्राटे भर रहे हैं
देखा मैंने कि
स्कूल भी गरीबों और अमीरों में बंट गए
देखा मैंने कि
महंगे अस्पतालों से मायूस
जनता रामदेव बाबा के आसन सीख रही है
आसाराम बापू के नुस्खे आजमा रही है
देखा कि
राखी सावंत फैसले कर रही है
वेदांता और जिंदल पुरस्कृत हो रहे हैं
सोचा नहीं
मैंने सोचा नहीं
इन घटनाओं पर क्या सोचना
क्या ये सोचने लायक हैं
मुंबई की चीखों के बारे में क्या सोचना
ठाकरे नीति के बारे में क्या सोचना
मायावती, राबड़ी, लालू के बारे में,
वरुण की जहरीली जुबान के बारे में
नरेंद्र मोदी की सफलताओं के बारे में
कश्मीर पर देश की विफलताओं के बारे में
अमरीका, चीन, पाकिस्तान के बारे में
क्या सोचना
देखा, सुना, सूंघा, महसूसा
मैंने सोचा नहीं
सुकून से रहा मैं
सुनता हूं देश भी सुकून से है
यानी.....
------------------------------------
(खुदा की कसम
मजा आ गया
मुझे मारकर वो बेशरम
खा गए
खा गए
लेकिन मैं तो जिंदा हूं
ये जीना भी कोई जीना है लल्लू, आयं)
------------------------------------
(खुदा की कसम
मजा आ गया
मुझे मारकर वो बेशरम
खा गए
खा गए
लेकिन मैं तो जिंदा हूं
ये जीना भी कोई जीना है लल्लू, आयं)
सदस्यता लें
संदेश (Atom)