सोमवार, 8 नवंबर 2010

एक प्रश्न

बीबीसी में खबर है कि बराक ओबामा की यात्रा के विरोध में माओवादियों ने बंद का आयोजन किया और जमकर तोड़फोड़ मचाई। कई जगहों पर रेल पटरियों पर विस्फोट किए। बात अपने समझ में नहीं आई। इसमें बराक ओबामा का क्या गया।

रविवार, 7 नवंबर 2010

देखिए न हुजूर

देखिए न हुजूर
कितना मारा है
इधर देखिए हमारी पीठ
जांघों पर ये लाल निशान
जबड़ा ही तोड़ डाला कंबख्तों ने
पूरी की पूरी बत्तीसी हिला डाली
देखिए न हुजूर....
कुछ कीजिए आका
बस आपका ही आसरा 
जी, 
जी, हो जाएगा हुजुर
किधर किधर दस्तख्त मारे बताइए
बिजनेस आप ही करेंगे, शपथ
थैंक्यू सर
आप आए हम निहाल हैं
कहें तो स्वागत में अपनी चमड़ी ही बिछा दें
आपकी दोस्ती के लिए थैंक्यू सर
पर देखिए हुजूर
हम तो बोल भी नहीं पा रहे
बहुत मारा है हुजूर
जबड़ा तक सुजा डाला
पीठ देखिए न हुजूर
जांघे

जब बोलूंगा

ये अलग बात है
कि इस वक्त
तुमसे बेहद डरा हुआ हूं मैं
पर जिस रोज मैं बोलूंगा
खूब बोलूंगा

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

जरा इधर भी: जल रहे जज्बात

जरा इधर भी: जल रहे जज्बात: " शब्द मायूस हैं संवेदनाएं खामोश जज्बातों के खंडहर में फड़फड़ा रही है अभिव्यक्ति ये कैसा समय है दोस्तों कि हम और तुम बहुत कुछ कहना चाह रहे ह..."

बुधवार, 3 नवंबर 2010

जल रहे जज्बात

  शब्द मायूस हैं
संवेदनाएं खामोश
जज्बातों के खंडहर में
फड़फड़ा रही है अभिव्यक्ति
ये कैसा समय है दोस्तों
कि हम और तुम
बहुत कुछ कहना चाह रहे हैं
और कुछ भी कह नहीं पा रहे

कितनी गर्म है हवाएं
और कितनी भयंकर ये रात
सूरज कैद है
दुश्मनों की हवेली में
पर जरा ठहरो. . .
उधर वो उजियाला कैसा
वो लहराता उजियाला
वही वो मद्दिम-मद्दिम सा
कुछ जल रहा है वहां
अरे!!
ये तो जज्बात हैं
हमारे तुम्हारे
ये तो फड़फड़ाती अभिव्यक्ति है
हमारी तुम्हारी
. . . . . तो रोशनी की उम्मीद
अभी बाकी है दोस्तों!!

-केवल कृष्ण

सोमवार, 1 नवंबर 2010

... छोड़ो ये ना सोचो

सोचता हूं कुछ लिखूं
क्या लिखूं
लिखने से पहले सोचना बहुत जरूरी होगा शायद
और सोचना तो बरसों पहले ही छोड़ दिया है मैंने
सोचता कौन है
वही, जो जिंदा रहता है
यानी सोचने के लिए आदमी का जिंदा रहना पहली शर्त है
ठहरिए, मैं खुद को पहले टटोल लूं
क्या इतने दिनों तक सोचे बिना जिंदा हूं मैं
इधर कुछ धड़-धड़ कर रहा है
ध्यान से सुनता हूं तो सांसों की भी आवाज आती है
हाथ-पांव हिल तो रहे हैं, हंस तो रहा हूं, रो तो  रहा हूं
यानी जिंदा हूं मैं
तो निष्कर्ष यह कि बिना सोचे भी जिंदा रह सकते हैं हम
तब सोचना ही क्यों


पहले जब सोचता था
याद है, सोचते हुए बहुत तकलीफ होती थी
तब सोचता था कि लोग मेरी तरह सोचते क्यों नहीं
जितना सोचता उतनी ही तकलीफ होती
सोचा, दूसरों की तरह सोचना छोड़ क्यों न दिया जाए
तो मैने सोचना छोड़ दिया
सच पूछिए, न सोचते हुए बड़ा सुकून मिला
मेरी आंखें खुली हुईं थीं
दिमाग बंद
जब नक्सलियों ने 76 जानें लीं, मैंने नहीं सोचा
पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ किए मैंने नहीं सोचा
कारखाने की चिमनी भरभरा कर गिरी
दफ्न हो गए सैकड़ों मजदूर
पखांजूर में गरीब की लाश कुत्तों ने नोच ली
नारायणपुर में चंद्रू का घर बारिश में बह गया
सलमान खान ने यहां-वहां छेद डाला
मैंने नहीं सोचा, देखा जरूर
अरुंधती का बयान देखा
कलमाड़ी का जादू देखा
देखा कि मेरा राज्य कितनी तरक्की कर रहा है
शहर की सरहद पसर रही है
खेत गायब हो रहे हैं
जमीन बेचकर किसान मोटर साइकिलों में फर्राटे भर रहे हैं
देखा मैंने कि
स्कूल भी गरीबों और अमीरों में बंट गए
देखा मैंने कि
महंगे अस्पतालों से मायूस
जनता रामदेव बाबा के आसन सीख रही है
आसाराम बापू के नुस्खे आजमा रही है
देखा कि
राखी सावंत फैसले कर रही है
वेदांता और जिंदल पुरस्कृत हो रहे हैं

सोचा नहीं
मैंने सोचा नहीं
इन घटनाओं पर क्या सोचना 
क्या ये सोचने लायक हैं
मुंबई की चीखों के बारे में क्या सोचना
ठाकरे नीति के बारे में क्या सोचना
मायावती, राबड़ी, लालू के बारे में,
वरुण की जहरीली जुबान के बारे में 
नरेंद्र मोदी की सफलताओं के बारे में
कश्मीर पर देश की विफलताओं के बारे में
अमरीका, चीन, पाकिस्तान के बारे में
क्या सोचना

देखा, सुना, सूंघा, महसूसा
मैंने सोचा नहीं
सुकून से रहा मैं
सुनता हूं देश भी सुकून से है
यानी.....



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(खुदा की कसम
मजा आ गया
मुझे मारकर वो बेशरम
खा गए

खा गए
लेकिन मैं तो जिंदा हूं


ये  जीना भी कोई जीना है लल्लू,  आयं)