शनिवार, 27 नवंबर 2010

अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी लगाता है झाड़ू

  राजनांदगांव से एसके बाबा
ओलंपिक जैसे खेलों में पदक विजेता खिलाड़ियों को करोड़ों रुपए का नगद इनाम देने की राज्य सरकार की एक दूरगामी सोच है जबकि वर्तमान में जो खिलाड़ी श्रेष्ठ प्रदर्शन के आधार पर अन्य स्पर्धाओं में पदक जीत रहा है। उसके लिए सरकार के पास फिलहाल कोई योजना नहीं है। खेल में रोजगार एवं आजीविका की कमी की वजह से ही अब खिलाड़ी या तो यहां से पलायन कर रहे हैं या फिर खेल छोड़कर आजीविका के लिए दर-दर भटक रहे हैं।
नि:शक्तजनों के लिए बनी भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्य एवं पूर्व अंतरराष्टÑीय  खिलाड़ी दीपेश कुमार यादव ऐसे ही एक युवक है जो खेल छोड़कर अपने प्रमाण-पत्रों  के दम पर रोजगार की तलाश में परेशान है। काफी मशक्कत के बाद भी जब कुछ काम नहीं मिला तो मजबूरी वश एक निजी संस्थान में वह झाड़ू-पोछा का काम कर घर की जिम्मेदारी संभाल रहा है।
बीएनसी मिल चाल निवासी एवं बहुमूखी प्रतिभा का धनी दीपेश नि:शक्त है एवं आठवीं उत्तीर्ण है। इसकी प्रतिभा का लोहा भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान कपिल देव एवं पाकिस्तान के पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख्तर  भी मान चुके हैं और उपहारस्वरूप अपना आटोग्राफ वाला बल्ला उन्होंने दीपेश को उपहार में दिया है। एशियन खेलों एवं स्पेशल ओलंपिक स्पर्धाओं में दीपेश के नाम कई गोल्ड मेडल है। क्रिकेट  में जहां वह आल राउंडर के भूमिका पर होता है वहीं व्यक्ति खेलों में भी वह चैंपियन है। प्रमाण-पत्रों की लंबी फेहरिशत इस बात का बयां कर रही है। सन् 2004 में गुजरात के अहमदाबाद में आयोजित पहली एशियन पेसिपिक इंटरनेशनल क्रिकेट स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन के लिए उसे मैन आॅफ द मैच और मैन आफ सीरीज के साथ दोहरा खिताब मिला।
पहली इंटरनेशनल स्पेशल ओलंपिक क्रिकेट स्पर्धा में भी उसने भारत का प्रतिनिधित्व किया। यह स्पर्धा  मुंबई में हुई थी। गुजरात के बड़ोदा एवं कोरबा के स्पेशल ओलंपिक इंडिया में व्यक्तिगत खेलों की स्पर्धा गोला फेंक, ऊंची कूद, दौड़ आदि में गोल्ड व सिल्वर मेडल जीता था।


इस प्रदर्शन के आधार पर उसका चयन चीन, सिंगापुर व हांगकांग में होने वाली अंतरराष्टÑीय स्पर्धा के लिए हुआ था, लेकिन कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण वह इन स्पर्धाओं में शामिल नहीं हो सका। मंदबुद्धि बच्चों के लिए मुंबई में आयोजित एक प्रदर्शन मैच में फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार की गेंद को स्टेडियम के पार पहुंचाना जहां उसका एक यादगार पल है। वहीं कपिल देव व शोएब अख्तर द्वारा भेंट किए गए बल्ले को वह अब तक का सबसे कीमती उपहार मानता है।
नेशनल लुक से चर्चा करते हुए दीपेश बताता है कि अखाड़ा उसके बचपन का शौक है जिसके बिना, वह खुद को अधूरा मानता है। उसका कहना है कि नि:शक्तों के लिए केंद्र व राज्य सरकार कई योजनाएं बना रही है किन्तु अब तक उन्हें किसी भी योजना का लाभ नहीं मिल पाया है। आज हर क्षेत्र में पैसा व पहुंच काम कर रहा है। इसके दम पर कई स्तरहीन खिलाड़ी रोजगार एवं सम्मान पा रहे हैं। गरीब पारिवारिक स्थिति के कारण आजीविका के रोजी-रोटी की तलाश थी। नि:शक्त  होने के कारण कोई अच्छा काम नहीं मिल पा रहा था। मजबूरी में उन्होंने एक निजी संस्था में झाड़ू-पोछा का काम करना पड़ा। दो साल बाद उन्हें यहां पदोन्नति मिली। अब उन्हें चाय-पानी पिलाने का काम सौंपा गया है।
दीपेश का मानना है कि मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह खेल प्रेमी है। वे राज्य ओलंपिक संघ के अध्यक्ष है। उनकी पहल पर ही इन दिनों मिनी ओलंपिक चल रहा है। इस नाते गरीब एवं प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के लिए कोई ठोस पहल की जाए। इस बारे में मुख्यमंत्री से नि:शक्त खिलाड़ियों के लिए पहल की उम्मीद है। उसका कहना है कि खिलाड़ियों को प्रोत्साहन नहीं मिला तो एक दिन उनकी खेल भावना दम तोड़ देगी।
(दैनिक नेशनल लुक से साभार)

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

मैं न तो लालाजी को जानता हूं, न मुक्तिबोध को

मेरे मित्र राजीव रंजन प्रसाद ने अपने ई-पत्रिका साहित्य-शिल्पी में लाला जगदलपुरी का साक्षात्कार प्रकाशित किया है। कई मायनों में यह साक्षात्कार अत्यंत महत्वपूर्ण है। राजीव ने इस साक्षात्कार की लंबी भूमिका में कहा है कि यदि आप लालाजी  को नहीं जानते तो मुक्तिबोध को भी नहीं जानते। लालाजी से जड़ी कुछ मेरी भी यादें हैं, मैंने राजीव से उन्हें शेयर किया है। आप सबों से करना चाहता हूं। पर साहित्यशिल्पी में साक्षात्कार जरूर पढ़ेhttp://sahityashilpi.com/




कभी तो गिरेंगे दाने
इसी आस में 
चिडिया
रातभर आसमान तकती बैठी रही
सुबह हुई 
तो दाने गायब
सूरज ने  डांट  लगाई
क्यों री चिडि़या
सारे दाने कैसे चुग  गई


राजीव, 
लाला जगदलपुरी का जिक्र होता है तो ये लाइनें याद आती हैं।  ये लालाजी की ही कविता की पंक्तियां हैं, हालांकि मुझे कच्ची-पक्की ही याद है। चिड़िया रातभर भूखी थी, आसमान तकती रही। लालाजी देख रहे थे। उसकी भूख को, उसकी उम्मीदों को, लबालब आसमान को। रातभर लालाजी देख रहे थे। मुझे लगता है कि चिड़िया की जो हालत थी, लालाजी की भी वही रही होगी। यदि ऐसा न होता तो लालाजी अपनी थैली से दाने निकालकर चिड़िया को जरूर दे दिए होते। यानी एक भूखा आदमी एक चिड़िया की उम्मीदों को रात भर सहन करता रहा। सहन इसलिए करता रहा, क्योंकि चिड़िया भले न जाने लालाजी जरूर जानते थे कि न तो दाने गिरने वाले और न ही भूख मिटने वाली। लालाजी ने आसमानी साजिशों का तत्काल भंडाफोड़ भी नहीं किया, शायद इसलिए कि कम से कम झूठी उम्मीदों में ही सही, चिड़िया रातभर तो जिंदा रहेगी।वे सुबह तक जागते रहे, सूरज ने जब डांटा तब भी  लालाजी ने सुना और यह भी देखा कि बेचारी भूखी चिड़िया उस डांट से कैसे सकपका गई थी। मैं दावे से कह सकता हूं कि जब चिड़िया सकपका रही होगी तो लालाजी छटपटा रहे होंगे। 
माफ  करना मेरे भाई, बड़ी शर्मिंदगी से यह स्वीकार कर रहा हूं कि मैं लालाजी को नहीं जानता। ठीक उसी तरह नहीं जानता जैसे मैं मुक्तिबोध को नहीं जानता। दोनों को जानने के बहुत से मौके थे, लेकिन मैं अपने में ही मस्त रहा। मैं जिस पेशे में हूं, उसमें इन जैसों को जानना उतना जरूरी भी नहीं रहा अब तो। हमें यह जानना ज्यादा जरूरी होता है कि शहर और राज्य में बड़े विज्ञापनदाता कौन-कौन लोग हैं। किन किन सम्मानीय नेताओं की फोटो रोज छापनी चाहिए। इन्हीं  लोगों को जानते-जानते मुक्तिबोध और लालाजी मुझसे छूट गए। 
लेकिन चिड़ियाएं लालाजी को जानती हैं, वे उनके रिपोर्टर जो हैं। वे उनके साथ भूखे रहते हैं और सूरज के खिलाफ रिपोर्ट लिखकर उसे बेनकाब कर देते हैं। वे दुनिया को बता देते हैं कि सारे दाने गायब करने वाला यही तो है। मैं लालाजी को जानता हूं कि नहीं यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, लालाजी को चिड़ियाएं जानती हैं और चिड़ियाओं को लालाजी जानते हैं। 
लाला जगदलपुरी ( छाया-राजीवरंजन प्रसाद)
राजीव तुम तो दोस्त हो मेरे, जब हम लालाजी के करीब थे तब तुमने मुझे क्यों नहीं टोका कि थोड़ा लालाजी को जान लें। मुझे याद है तब हम बहुत सी पत्रिकाएं भी पढते थे। देशभर में छपने वाली पत्रिकाएं। जगदलपुर से छपने वाली पत्रिकाएं। बस्तर की स्थानीय लघु पत्रिकाओं में देशभर के कवि-साहित्यकार तो छपते थे, पर लालाजी या तो नदारत रहते थे या फिर औपचारिक रूप से ही उपस्थित रहते थे।
राज, यार इन्हीं पत्रिकाओं को देख पढ़कर हमें भी तो साहित्यकार हो जाने का चस्का लगा था। एक पत्रिका बचेली से हमने भी छाप डाली थी-प्रतिध्वनि। मुझे तो याद नहीं, तुझे याद है क्या कि क्या तब हम लालाजी को जानते थे। मैं भी तब कुछ-कुछ लिखा करता था, यहां-वहां छपा भी। आकाशवाणी से भी प्रसारित हुआ। लेकिन आज अपने लिखे हुए को पढ़ता हूं तो स्वीकार करता हूं कि साहित्य की समझ न तो मुझे तब थी और न अब है। मैं दंडकारण्य समाचार में काम करता था और साहित्य पेज की जिम्मेदारी मुझ पर ही थी। यानी बंदर के हाथ में उस्तुरा। जब्बार ढाकवाला से लेकर त्रिजुगी कौशिक, विजयसिंह, योगेंद्र मोतीवाला, मदन आचार्यजी.....से मेल-मुलाकात शुरू हुई। लालाजी के पास भी जाया-आया करता था। लालाजी ने दंडकारण्य समाचार में खूब लिखा। एक हल्बी अखबार निकलता था-बस्तरिया। लालाजी की कविताएं उनमें भी छपा करती थी।...एक रोज मैं कविता मांगने लालाजी के पास पहुंचा तो उन्होंने मुझसे कहा था-अखबार वाले कविताएं तो मांगते हैं पर पत्रम्-पुष्पम् नहीं देते। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा था कि कवि की आत्मा जिस शरीर में रहती है, उसे तो जिंदा रखना ही पड़ता है।
राजीव, तुमने जो तस्वीर छापी है, वह नकली है। उसकी पृष्ठभूमि नकली है। इतना वैभव लालाजी के इर्द-गिर्द हो ही नहीं सकता। यह जरूर किसी और का वैभव होगा, जिसे लालाजी को जीना पड़ रहा होगा। मैं तो उस छोटी सी खोली को जानता हूं जो डोकरीघाट पारा में कवि निवास नाम के बड़े से घर के बिलकुल बाहरी हिस्से में है। यही लालाजी का साधना कक्ष है और शर्त लगा सकता हूं कि यह खोली भी लालाजी की पूंजी नहीं हो सकती। तुम्हारे द्वारा प्रकाशित तस्वीर में यह वैभव जिस भी व्यक्ति का होगा, मेरा अनुमान है कि उसका वैभव लालाजी को करीब पाकर और भी बढ़ रहा होगा। ठीक उस तरह जैसे अखबारवाले लालाजी की कविताओं को छापकर वैभवशाली हो जाया करते थे। पर लालाजी तो आसमानी साजिशों को खूब समझते हैं। चलो इस कविता को फिर पढ़ते हैं-

कभी तो गिरेंगे दाने
इसी आस में
चिड़िया 
रातभर आसमान तकती बैठी रही.....

लालाजी ने पुष्पम्-पत्रम् मांगा....कहा शरीर तो जिंदा रखना ही पड़ता है। यदि लालाजी को पुष्पम्-पत्रम् मिल गया होता तो न तो वे महल खड़ा करते और न ही फैक्ट्रियां खोलते। इतना जरूर होता कि उनके भीतर का स्वाभिमानी इनसान अपनी कमाई रोटियों में थोड़ा स्वाद और घोल लेता। जो आदमी हर क्षण सिर्फ कविता को जीता हो, जो हर क्षण अनुसंधान करता हो, जो दिन-रात लिखने पढ़ने में ही लगा रहता हो, उसे दुनियावी तरीके से रोटियां कमाने में बड़ी मुश्किलें होती होंगी भाई। लालाजी ने जो शब्द मुझसे कहे थे, शायद वे किसी और से न कहते। मैं बच्चा था, मेरे साथ वे भी बच्चे हो जाते थे। लालाजी को बिलकुल ठीक-ठीक पता था कि ये बच्चा पुष्पम्-पत्रम् नहीं दिला सकता।दंडकारण्य समाचार और बस्तरिया से उनका वैसा रिश्ता था भी नहीं। वे इन दो अखबारों से वैसे ही जुड़े थे, जैसे बस्तर से जुड़े हैं।निःस्वार्थ।उनकी पीड़ा उन अखबारों को लेकर थी जो महानगरों से प्रकाशित हुआ करते थे,और यही पीड़ा मेरे सामने व्यक्त हो गई। लालाजी जानते थे कि ये बच्चा पुष्पम्-पत्रम् नहीं दिला सकता। जो लोग दिला सकते थे उनके आगे लालाजी ने कभी हाथ नहीं पसारे। कई मौकों पर उन्होंने पुरस्कार सिर्फ इसलिए ठुकरा दिए क्योंकि इन्हें पाने के लिए आवेदन जमा करने की शर्त हुआ करती थी। लालाजी भूखे जरूर है, पर मांगेंगे नहीं। हर सुबह उनके हिस्से के दाने गायब हो जाते हैं। लालाजी सहन कर रहे हैं क्योंकि उनके साथ-साथ चिड़िया भी तो भूखी है और इसी चिड़िया के लिए वे जिंदा है। 
लालाजी की वसीयत (साभार-साहित्य शिल्पी)
भाई मेरे लालाजी कितने उदार हैं इनकी कई किंवदंतियां हैं। उनकी रचनाएं चुरा-चुराकर कितने लोगों ने डाक्टरी कर ली, इसके भी कई किस्से हैं। जितनी चोरियां हुईं, लालाजी ने उतना ज्यादा रचा। चोरों को पास बिठा-बिठाकर रचनाएं दिखाईं। पढ़ाईं। 
मुझे साहित्य की समझ न तो तब थी और न अब है। लेकिन साहित्यकार होने के फैशन के उस दौर में मैं भी शामिल हो गया था। एक फोल्डर पत्रिका प्लान कर ली। और मेरी हिम्मत देखो राजीव मैं मदद मांगने लालाजी के पास जा पहुंचा। पता है लालाजी ने बड़ी आत्मीयता से मुझे बिठाया। वे मुझसे उस फोल्डर के प्रारूप की चर्चा करने लगे। उन्होंने ही मुझे उस फोल्डर का शीर्षक सुझाया-विन्दु। पता है यह शीर्षक आसानी ने नहीं मिला। उन्होंने लंबा अनुसंधान किया। कई शब्दकोष खंगाले। जब शीर्षक तय हो गया तो उन्होंने मुझे एक लघुकथा दी छापने के लिए। वह फोल्डर लघुकथाओं पर केंद्रित था। रउफ परवेज समेत कई आदरणीय लोगों ने मुझे लघु-कथाएं दीं। शायद इसलिए क्योंकि उसमें लाला जगदलपुरी छप रहे थे। फोल्डर का प्रुफ खुद लालाजी ने पढ़ा। इस फोल्डर  का विमोचन सूत्र के एक समारोह में हुआ। रमाकांत श्रीवास्तवजी समेत कई दिग्गज साहित्यकारों की मौजूदगी में। वो एक बड़ा साहित्यिक समारोह था। उस समारोह में मैं साहित्यकारों के साथ फोटो खिंचवा रहा था, लालाजी एक कोने में निर्विकार बैठे थे। मेरी संकोच देखो कि तब मैं सोच रहा था कि इस मामूली से फोल्डर में लालाजी के योगदान का उल्लेख करना उनके प्रति सम्मानप्रद होगा कि नहीं। लेकिन आज मैं उस मामूली फोल्डर में उनके योगदान का ढिंढोरा जोर-जोर से पीटना चाहता हूं। इतना बड़ा आदमी, कितना बड़ा काम। 
राजीव भाड़ में जाए सरकारें, अपन तो लालाजी के चरणों में ही मस्त हैं। 
और हां मैं उन्हें जानना चाहता हूं राजीव, कोई चाहे या न चाहे। 

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

वैचारिक स्वराज से ही आतंकवाद का सामना संभव

  डा. मिश्र और जयप्रकाश को गजानन माधव मुक्तिबोध सम्मान
रिपोर्ट -रविंद्र ठेंगड़ी 
 महाराष्ट्र मंडल ने गुरुवार को वरिष्ठ आलोचक डा. राजेंद्र मिश्र और युवा समालोचक जयप्रकाश को गजानन माधव मुक्तिबोध से सम्मानित किया। इस मौके पर उपस्थित मुख्यअतिथि डा. श्रीपाद भालचंद्र जोशी ने कहा कि दुनिया का सबसे बड़ा आतंक लोगों को विचार शून्य बनाने वाले बाजारवाद से नियंत्रित ‘मीडिया’ है और इससे केवल ‘वैचारिक स्वराज’ से ही निपटा जा सकता है।
रायपुर। महाराष्ट्र के वरिष्ठ साहित्यकार व शिक्षाविद डा. भालचंद्र जोशी ने ‘आतंक का माध्यम व माध्यम का आतंक’ विषय पर अपने सारगर्भित संबोधन में कहा कि इस समय दुनिया में 87 फीसदी मीडिया छह मीडिया समूहों के माध्यम से संचालित हो रहे हैं। यही लोग पूरे विश्व में और भी कई कंपनियां चला रहे हैं और इनके मुनाफे की कल्पना नहीं की जा सकती। इनकी महत्वाकांक्षा असीमित है। ये लोग चाहते हैं कि आमजनों को पूरी तरह वैचारिक रूप से शून्य बनाने के बाद उन्हें केवल अपने ब्रांड की वस्तुओं को खरीदने के लिए विवश किया जाए।
पता ही नहीं चलेगा गुलामी का
उन्होंने कहा कि शस्त्र से होने वाले आतंक का मुकाबला शस्त्र से किया जा सकता है, लेकिन यदि आदमी को इस स्थिति में ही ला दिया जाए कि वह विचार ही न कर सके, या वह वही सोचे, समझे और देखे, तो मीडिया उन्हें दिखाना, समझाना और बताना चाहता है। ऐसी खतरनाक स्थिति में तो उसे पता ही नहीं चलेगा कि वह कब गुलाम हो गया। उन्होंने कहा कि हम माध्यमों में ही विभिन्न प्रकार के आतंक की गहरी समीक्षा देखते हैं और उसके निदान के लिए भी बड़ी-बड़ी बातें सुनते हैं, जबकि जरूरत माध्यम के आतंक का पहचानने, समझने और उससे निबटने पर मंथन होना चाहिए। इस पर कोई माध्यम न तो कोई कार्यक्रम आयोजित करता है और न ही किसी को इस विषय पर बोलने या लिखने की आजादी मिलती है।
अखबारों में सब्सिडी क्यों?
डा. जोशी ने कहा कि आज सब्सिडी हटाने की बात उठती रही है। पेट्रोल, केरोसीन, एलपीजी गैस से लेकर हर अनुदान प्राप्त वस्तुओं से अनुदान हटाने या कम करने की मांग प्रशासनिक स्तर पर उठती रहती है। अर्थशास्त्री भी अनुदान घटाने की ही वकालत करते हैं। ऐसे में अनुदान प्राप्त अखबारों से अनुदान हटाने की बात कोई नहीं करता। यह नहीं कहा जाता कि यदि 38 रुपए का टाइम्स आफ इंडिया है तो उसे उतनी ही कीमत पर पाठकों तक पहुंचना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि बड़ी मल्टी नेशनल कंपनियां ऐसा नहीं होने देंगी। वे तो पाठकों तक मुफ्त में अखबार पहुंचाने की कोशिश करेंगी और अभी भी लगभग मुफ्त में ही लोगों को अखबार मिल रहा है। दरअसल अखबारों और चैनलों में भी पाठकों-दर्शकों को वही पढ़ाया व दिखाया जा रहा है, जो मल्टी नेशनल कंपनियां अपने उत्पादों को बेचने के लिए दिखाना चाहती है और लोगों की वैचारिक क्षमता से लेकर उनके परिवार, समाज और राष्ट्र की संरचना को नष्ट-भ्रष्ट करना चाहती है।
मीडिया पर ऐसी शिक्षा कहीं नहीं
डा. जोशी ने कहा कि आज कहीं भी मीडिया का आशय, क्यों, कैसे, किसके लिए, किसके लिए नहीं, औचित्य, आवश्यकता जैसे विषयों पर शिक्षा नहीं दी जाती। इस विषय पर कहीं कोई सामग्री नहीं मिलती। क्योंकि ऐसे विषयों से ही लोगों को वैचारिक रूप से सशक्त होते हैं। जयप्रकाश के संबोधन का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि आज लेखक अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना नहीं चाहता क्योंकि उसकी पुस्तक पढ़ने वाले पाठक ही नहीं है। असल में पाठक तो बहुत है लेकिन एक लेखक को जिस वर्ग के पाठक की जरूरत है, वह अब लगातार सुकुड़ते हुए अति सूक्ष्म हो चुके हैं। अमेरिका में शुरू से ही अवधारणा आ गई थी कि यदि परमाणु हथियार, सैनिक, व्यापारी, राजनीति और प्रशासन एक हो जाए, तो पूरी दुनिया पर राज किया जा सकता है और आज इसी अवधारणा पर पूरी दुनिया पर काम हो रहा है।

बढ़ते कदम

  मेडिकल कालेज रायपुर के इतिहास में 50 वर्षों में केवल 4  लोगों ने देहदान किया था। इस प्रकार 12 वर्षों में केवल एक ही देहदान होता था, लेकिन  सामाजिक संस्था बढ़ते कदम के प्रयासों से मेडिकल  कालेज रायपुर को 3 वर्ष में 12 शव मिले हैं। अब न केवल चिकित्सा छात्रों बल्कि डेंटल, आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक एवं नर्सिंग कालेज के विद्यार्थी भी उपलब्ध देहदान पर खोज एवं अनुसंधान करने लगे हैं। स्व.हर्षा रामवानी का मेडिकल कालेज को किया गया देहदान, संस्था द्वारा करवाया गया 31वां देहदान था।
बढ़ते कदम संस्था के देहदान प्रभारी प्रेमचंद छाबड़ा एवं राजेश वाधवानी ने बताया कि अवनि विहार दलदलसिवनी निवासी हर्षा रामवानी का कल 24 नवंबर को कैंसर की बीमारी से एक निजी नर्सिंग होम में निधन हो गया था। उनके पति रमेश रामवानी ने बताया कि हर्षा ने लगभग एक वर्ष पूर्व देहदान करने की इच्छा व्यक्त की थी। वे समय-समय  पर देहदान करने के लिए स्मरण भी कराती रहती थीं। उन्हें यह प्रेरणा अखबारों के माध्यम से मिली थी। उनके अनुसार शव की उपयोगिता खोज एवं अनुसंधान में है। उनके परिवार में 2 बेटियां हैं। बड़ी बेटी भावना जैसिंघ मुंबई में विवाहित हैं एवं वर्तमान में अमेरिका में हैं। छोटी बेटी दिव्या देवानी नासिक में विवाहित हैं। उनके पति रमेश रामवानी बारदाने का व्यवसाय करते हैं।
(यह पोस्ट संस्था द्वारा जारी प्रेस नोट पर आधारित)

बुधवार, 24 नवंबर 2010

गुरुवार की नयी कहानी-लक्ष्मी माता की तिजौरी

बहुत पुरानी बात नहीं है। बिलकुल हाल की है। आज की ही। लक्ष्मी माता की तिजौरी गुम हो गई। तिजौरी समझते हैं न आप। वहीं जिसमें पैसे-वैसे रखते हैं। वही तिजौरी। लक्ष्मी माता परेशान। ढूंढने लगी यहां-वहां। लेकिन तिजौरी तो पानी में गिर गई थी। अपने घर के पास जो तालाब है ना, उसी में। लक्ष्मी माता वहां पर गईं। वहां शंकर भगवान मिले। शंकर भगवान का मंदिर है ना वहां पर। शंकर भगवान ने पूछा तो लक्ष्मी माता ने उन्हें बताया कि तिजौरी पानी में गिर गई। तो शंकर भगवान ने कहा कि मैं मदद करूंगा। उनके गले में सांप है ना, जो घिसट-घिसट कर चलता है। वो सांप पानी में उतरा। नीचे जाकर देखा तो तिजौरी एक पत्थर के नीचे फंसी हुई थी। सांप ने अपनी पूंछ से तिजौरी को निकाल लिया। फिर शंकर भगवान ने लक्ष्मी माता को दे दिया। लक्ष्मी माता तिजौरी लेकर विष्णु भगवान के पास आ गईं।


(कभी-कभी बच्चों की बातें और कल्पनाशीलता हैरान कर देती है। मेरी साढ़े चार साल की बिटिया ने यह कहानी मुझे फोन पर सुनाई। उसी की गढ़ी हुई है। जब मम्मी गुरुवार के व्रत की तैयारी कर रही थी तब बिटिया कहानी गढ़ रही थी। हो सकता है कि मैं अपनी बिटिया को शायद ज्यादा ही छोटी समझता हूं, लेकिन इस दौर के  बहुत से बच्चे मुझे जब-तब अपने बड़प्पन से मुझे चौकाते रहते हैं।)

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

बस इतना (कविता)

मुझे क्या चाहिए
बस इतना कि दोनों बांहें पसार कर
जब मैं कहूं आओ
तो तुम आ जाओ

मुझे क्या चाहिए
बस इतना कि तुम्हारा हाथ थाम कर
जब मैं कहूं चलो
तो तुम साथ चलो

मुझे क्या चाहिए
बस इतना कि बेहद उदास क्षण में
जब मैं डूबता जाऊं खुद के भीतर
तब उबार लो मुझे

मुझे क्या चाहिए
बस इतना कि जब मैं हारने लगूं
तब तुम कहो
लड़ो, अभी और लड़ो

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

कामचोर को सलाम

पुरानी इमारत के भीतर, छत के बिलकुल करीब की  खिड़की पर एक कबूतर फड़फड़या तो उसने एक लंबा बांस उठा लिया। इतने लोगों की भीड़ में वह इकलौता था, जिसकी नजर उस परिंदे पर गई थी। थोड़ी ही  देर में कबूतर उसकी मुट्ठी में था। यह सरकारी इमारत थी और वह सरकारी मुलाजिम। काम के वक्त वह कबूतर पकड़ रहा था। मैंने मन ही मन उसे गाली थी और कामचोर हो रहे सारे सरकारी कर्मचारियों को भी। यह निश्चित ही जंगली कबूतर था। मुझसे रहा  नहीं गया तो पूछ बैठा-क्या तुम इसे खाओगे। वह कुछ न बोला। मैंने पूछा क्या पालोगे-इस बार बड़ी देर तक खामोश रहने के बाद उसने कहा-यह  जंगली है, रोकने की कितनी भी कोशिश करो उड़ जाएगा। इसे पाला नहीं जा सकता। मैंने फिर पूछा-तब तो तुमने इसे खाने के लिए ही पकड़ा है न। उसने कहा-मैं कबूतर नहीं खात। मैं हैरान था-तो क्यों पकड़ा, क्या किसी और के लिए है, क्या कोई बीमार है, क्या उसकी दवा के के लिए इसके खून और मांस का उपयोग करोगे, कई सावल मैंने दागे। उसने कहा-नहीं।
तो फिर क्यों पकड़ा। 
वह जवाब नहीं देना चाहता था शायद। मैंने जोर देकर पूछा तो उसने कहा-यह अभी बच्चा है। भटक गया है शायद।  यह या तो बिल्ली-कुत्ते का शिकार हो जाता या फिर किसी ऐसे आदमी के हाथ पड़ जाता जो इसे खा जाता। इसलिए मैंने पकड़ लिया। उसने कहा-मैं अब इसके पर कतर कर घर पर रखूंगा, जब यह बड़ा हो जाएगा  तो इसे नये परों के साथ उड़ा दूंगा। 
अब मैं सोच रहा था कि ऐसे ही  कामचोर हर सरकारी दफ्तर में क्यों नहीं होते।